कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 968, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १०० )
कबीरबानी
साखी-कहै कबीर
देखि स्वरूप कन्यहिको, मनमें रोष समाय । मनमें रोष भयो अति, कन्या लीन्हीं खाय ॥
लीलत कन्या कीन्ह पुकारा । पुरुष वचन ले हृदय सम्हारा ॥ तब सुरति बानते कैलहि मारा । कन्या तब उगलै बहि पारा ॥ एहि प्रपंच अक्षर तब कीन्हा । ताते कैल मती हरि लीन्हा ॥ कन्या सुरति तब गई भुलाई । जबते पेट कैलके आई ॥ पिता पिता कैलसो कहेऊ । मदन प्रचंड कल छन भयेऊ ॥ अष्टांगी कैल एकमत कीन्हा । ताते सृष्टि रचवे मन दीन्हा ॥ किया संयोग भयो त्रीवारा । जेठो ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥ तीजे शंभु विष्णु ते छोटा । येकही निरंजनहि के ढोटा ॥
साखी-कहै कबीर
जैसे रूप निरञ्जनहिं, तैसे तीनों भाय । जे उत्पत्ति कैलकी, आगे सृष्टि उपाय ॥
चौपाई
करि प्रपंच शून्य इंडमें गयऊ । मनमें बहुत आनंदित भयऊ ॥ एहि आनन्दमें गए भुलाई । ताते श्वासा सुरति उठाई ॥ तेहि श्वासाते वेद कटि आई । रूपनिधान चारों बने भाई ॥ हाथन पोथी सुसरस बानी । ताते कैल भयो अभिमानी ॥ चारि वेद सब मरम बतावा । तब चलि अक्षर शून्यमें आवा ॥ कैल प्रचण्ड भयो बरियारा । तब अक्षरते बुद्धि विचारा ॥ येतो कैल औ जीव विचारा । समरथ छाप लियो टकसारा ॥ अक्षर चले अर्चित लगिगयऊ । महाशून्य छोड़ी तब दयऊ ॥ तब अर्चित्य अक्षर समुझावा । यह अविगति गति काहु न पावा ॥