भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

(१०३)

लोक दीपको ठौर बतायो । बैठक अस्नेह हंस चिन्हायो ॥ साखी-कैसे सरूप समर्थ हैं, कैसे हैं सब हंस । केहि करनीते पाइये, कैसे कटे कालकी फंस ॥ चौपाई-सतगुरु कबीर उवाच

कहे कबीर सुनो धर्मदासा । अल्पबुद्धि घटमाँह निवासा ॥ सत्य लोक है अधर अन्तुपा । तामें है सत्ताविस दीपा ॥ सत् शब्द का टेका दीना । अगम पोहुमीरचीतिन लीन्हा ॥ सागर सात ताहि विस्तारा । हंस चले तहाँ करै विस्तारा ॥ अग्रवास वह सुवरन कांती । तहाँ बैठे हंसनकी पांती ॥ पुहुपद्दीप है मध्य सिंहासन । करूपदीप हंसनको आसन ॥ अविगत भूषण अविगत सिंहारा । अविगत वस्त्र अविगत अहारा ॥ कमलस्वरूप भौम्य है भाई । कहाँकी उपमा देउ बताई ॥ आभा चन्द्र सूर्य नहीं पावहिं । भूल चूकके शीस नवावहिं ॥ कला अनेक सुख सदा होई । वह सुखभेद यहाँ लहे न कोई ॥ निरतै हंस पुरुषके सङ्ग । नखशिख रूप बन्यो बहु अंगा ॥ पुरुष रूपको बरनै भाई । कोटि भानु शशि पार न जाई ॥ छत्र सरूप को वरणै भाई । अविगत रूप सदा अधिकई ॥ सत्ताइस द्वीपमें करे अनन्दा । जो पहुँचे सो काटें फन्दा ॥ हंस हिरम्मर और सोहंगा । श्वेत अरुण रूप दोउ अंगा ॥ विमल जोतको है उजियारा । झलकै कला पुरुषमें भरा ॥ चारि शब्दका लोक बनावा । पाँच सरूप लै हंस समावा ॥ सत्य शब्दकी भूमि बनाई । क्षमा शब्द आसन निरमाई ॥ धिर्ज शब्दसों छत्र उजियारा । सुमत शब्दसों वस्त्र पसारा ॥ प्रेम शब्दसों हंस निरमाई । आप शब्दते लोक समाई ॥ दीपन करै दीप हंस बिहारा । तहाँ पुरुष निर्मल उजियारा ॥ जब विहंसे मुखमोड सुहाई । निरत हेरि विहंसे चितलाई ॥