कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 973, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधसागर
( १०६ )
धर्मदास उवाच
धर्मदास तब सौंज मँगाई । सोरह अंश तब दीन्ह चिन्हाई॥ चौका पुरस तब युक्ति बनाई । तनुका तोड़े जल अचनाई ॥ लिख्यो पान समरथ सहिदानी । दीन्हो सन्देश सत्यकी बानी ॥ तीनि अंशकी लगन विचारी । नारीअर अंशको हंस उवारी ॥ नारी पुरुष होय एक संगा । सदगुरु बचन दीन्ह सोहंगा ॥ सोहँग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ॥ पेड़ सोहँग और सब डारा । साखा सोहँ कीन्ह प्रकारा ॥ प्रथम सहज सोहँगकी बानी । दूसरि इच्छा सोह उपतानी ॥ तिसरे मूल सोहँ है भाई । चौथे सोहँ सोहँ निर्माई ॥ सोहँगते भये सोह अतीता । जाको नाम जो कह्यो अचित्ता ॥ अचित्तिते अक्षर सोहँगा । अक्षर सोहँगते कैल सोहँगा ॥ कैल सोहँगते त्रिगुण सोहँगा । सोहँगते सकल सृष्टिको रंगा ॥ अमृत वस्तुते नौ पकारा । सोहँग शब्दके सुमिरन सारा ॥ सो सोहँ अचीन्हि जो पावै । सोहँ डोर गहि लोक सिधावै ॥ जा घट होई सोहँ मतसारा । सोई आवहु लोक हमारा ॥ सुरति सोहँ हृदये महाँ राखो । परचे ज्ञान तुम जगमें भाषो ॥ एती सिद्धि सोहँकी भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ॥ चौका करि दीन्य परमाना । तब जीवहि छूटे अभिमाना ॥ अजावन बीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ॥ ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥ कुल करनी जिन्ह खोय निसाई । काटि फन्द निज घरकू जाई ॥ तन मन धनको मोह न आवै । सो जिव दर्स हमारा पावै ॥ गुरुसों अन्तर कबहुँ न कीजै । साधु सन्त सेवा मन दीजै ॥ एती सनद जीव उजियारा । ताको सुकृत आवै सठिहारा ॥ सोहँ करनी सोहँ विचारा । सोहँ शब्द है जिव उजियारा ॥