भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ११३ )

अठवें कमल कैल को वासा । नाम निरञ्जन तहाँ निवासा ॥ नौमे कमल तीन लोक बनाई । तीनि देव तहाँ रहे भुलाई ॥ पिंड ब्रह्मांडको लेखा सारा । ज्ञानी पंडित करौ विचारा ॥

साखी-कहै कबीर

पिंड ब्रह्माण्डको लेखा, हम दियो प्रकट बताय । कहै कबीर धर्मदाससों, तुम निर्भय लोक जाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास पूछे चित लाई । सदगुरुसे उठि विनती लाई ॥ सांचे साहबकी बलिहारी । कैल पुरुषकी जुगति विहारी ॥ पन्थ विकट कोइ भेद न पावै । जो नहिं सदगुरु आप लखावै ॥ प्रपंची है कैल अपारा । मोसो चलै न पन्थ तुम्हारा ॥ कैसे कै गुरुवाई करहुँ । कैल पुरुषसो मैं बहु डरहुँ ॥ जम्बुद्वीप है यम को देशा । कैसे चलिहै मुक्ति उपदेशा ॥ चार वेदमें सब जीव राचै । कैल फांसते कोइ न बांचै ॥ हम सेवक हैं आज्ञाकारी । सोइ करों मोहिं लेहु उबारी ॥

साखी-कहैं धर्मदास

हमसो पन्थ चलै नहीं, काल अपरबल बीर । घाट बाट सब रोक है, जिय कस लागे तीर ॥

चौपाई-सदगुरु कबीर उवाच

धर्मदास तुम्हें सांच न आवा । अन्तर खोली मैं तुम्हे बुझावा ॥ का पुनि करिहै काल तुम्हारा । सिरपर समरथ है रखवारा ॥ मारहु कैल रसातल जाई । केती कै हमही निर्माई ॥ केतिक कैल भये मम आगे । केति सृष्टि उत्पत्ति प्रलै भागे ॥ सत्य वचन सुनिये चितलाई । कैल जुगति मैं देहुँ लखाई ॥ सत् चल्ला है सबते न्यारी । तीनहि लोक प्रपंच पसारी ॥

नं. ७ कबीर सागर - ५