भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 983, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 983

बोधसागर

( ११६ )

ताके संग सखी बारा हजार । तहाँ महंमद गये सुखसारा ॥ तेहि सुखको उन्ह लहे भाना । आगे ओहं सोहंके स्थाना ॥ चौथी सृष्टि त्रिगुण परकासा । जो उपज्यो अक्षरकी श्वासा ॥ तिनके ज्ञान क्षुद्र है भाई । जन्त्र मन्त्र औ वेद भनाई ॥ राग रँग पूजा चतुराई । अहंकार मद गर्भ भुलाई ॥ जीव भोजते करे अहारा । नौलाखजीव सँग तिनके धारा ॥ तैंहिके ज्ञान जग रहे समाई । घर घर आये कुल बरन दड़ाई ॥ कोई उग्र कोइ क्षुद्र कहावै । कोइ जीवकोइ नारियर खावै ॥ कोई रोगी औषध भावै । कोई देवी कोई देव कहावै ॥ कोई प्रेत होय बोले आई । इह विधि सकल जीव भरमाई ॥ त्री देवा गुण रूप निवासा । इन सब भेद कीन्ह परकासा ॥ पाहन पूजा तिन ठहराई । कई विष्णु तहैं शम्भु कहाई ॥ ब्रह्मा तहाँ वेद धुन करहीं । विष्णु रूप तहैं पूजा धरहीं ॥ शम्भु भये फलके अधिकारी । तीन देव यह युक्ति विचारी ॥ इहि प्रपंच पांच मुख बानी । तेहि प्रपंचमें जीव भुलानी ॥ शुक्लहि पांच काल सहेदानी । जाये ले देह नर्ककी खानी ॥ धर्मदास तुम विन राचौ । सत्य चाल उहिकैलसों बांचौ ॥

चारि सुरतिका लेखा

चार सुरतिका भेद निन्यारा । सो सब खोलि कहूं भण्डारा ॥ तिनकी सनद एक है भाई । तेहि सनद ले जाय लेवाई ॥ यह ज्ञान ताकी चारों बानी । पांचे समर्थक पांच प्रमानी ॥ चारों गुरु चारी हैं बानी । पांचे शब्द सुरति सहिदानी ॥ पांचों भेद हैं अगम अपारा । इह पांचों सर्वांग विचारा ॥ चार अंश चार अण्ड प्रमाना । एके सनद एक बन्धाना ॥ चारों गुरु है जगमें आवा । तिन भवसागर पंथ चलावा ॥