भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

( ११९ )

प्रथम अंगते भए आगे सब निकास कई । सात इच्छा सातहीं अंश । अनइच्छाते आठों अंश भए । आठवाँ अंश भए । ते लोक भयो सर्व सृष्टिका संहार करे ।

बीजक सारकी साखी-कहैं कबीर ।

सात इच्छाके सात अंश भए, अपने अपने भाव ।

आठवा अंश विन इच्छा उपजै, ताको धर्म लखाव ॥

धर्मदास उवाच-एह धर्मदास ने पूछी ।

आहो साहेब काहेते समर्थ कहत हैं ? काहेते अचिन्त कहत हैं ॥ काहेते अक्षर कहत हैं ? काहेते जोगमाया कहत हैं ॥ काहेते कल कहत हैं ? इतना भेद कहो समुझाई ॥ भिन्न गुरु देह बताई । एहिकी शास्त्र गुरु कहैं ॥ सुनो धर्मदास तखतके धनी । तासो समर्थ कहत हैं ॥ तिनते आठ अंश भए । आठमें जेठ अचिन्त भये ॥ तिनके चिन्ता नाहीं । ताहिते अचिन्त कहाये ॥ तिनके प्रेम सुरति भई । तेहि प्रेममें अक्षर आनिसमानो ॥ तब मोह तत्व उपज्यो । तेहि मोहते चार अंश भए ॥ तेहिते चौरासी लक्ष्य जोनी भई । ८४००००० । तेहिते अक्षर ॥ कहाये । अब कैलकी हकी कत सुनो । तब अक्षरके मोहतत्त्व ॥ उपज्यो तेहि कारणते कैल भयो । मनसाते बुन्द पैदा कियो ॥ सो जहाँ अक्षर बैठो हतो । तहाँ जल तत्त्व हतो ॥ तेहि जलमें एक बुन्द आनिपडो । तेहि बुन्दते एते एक अंड भयो ॥ तब अक्षरने देखा उठिके । तब अण्ड लंगि आयो ॥ एक हकीकत लिखी हती । अंडके मुख ऊपर छाप हतो ॥ कहैं सृष्टिकी रचना करौ । और एक अंश हम पठायो है ॥ सो तुमते दूसरी करी है । सो तुम जिन पतियावो । जहाँ लंगि