भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१५)

अन्तरहित अनन्त सन्त महन्त तन गुण वन्दनम् ॥ धर्मदास जास विलास त्रास, कराँल जाल विभञ्जनम् । दलिहाँल दीन दयाल कीन्ह, निहाल सुनि मन रञ्जनम् ॥ ४ ॥

जय उग्रनाम अकाँम, मङ्गल धाम नित्य निर्गामयम् । भव श्रमित शुभविश्राम अति अभिराम पदप्रद निर्भयम् ॥ ५ ॥ मोह माया मान दम्भ मदादि मत्सर दूषणम् । रहित नानारोंग परम विरोंगसहित विभूषणम् ॥ साँनुरोध विरोध हरण, प्रबोधमय कारण परम् । विगत द्वन्द्व स्वच्छन्द, परमानन्दकन्द विनिर्भरम् ॥ कालशेषै खैगेश भवद्वैपदेश, भो ! कर्हणाकरम् । भव्यैवर वरदेश अखिल, अंशेष श्रेयै सुदाँवरम् ॥ भुक्तकञ्चदिनेशै ज्ञान धनेशै, कलेशजगद्भवम् ॥ शमन सकल अहेतु प्रभु, वृषैकेतु सेतुभवाणवम् शंभु यस्य पदाँरविन्द, पर्राग सञ्चितकैर्मजम् । व्याधिप्रबलभूत, अति अनुभूत पावन भैषजम् ॥ ६ ॥

भज सुखद परम प्रबोधैप्रद, प्रत्युह हरण कुपालके । पारिजातैकपर्णनवसम, चरण साहिबलालके ॥ ७ ॥ अरुण नखै बुति दिपैति, दिव्य दिगन्तै तमदलैमालके । ज्ञित विविध विकार कीन प्रहार भवभ्रम जालके ॥ मृदुलै मँजु पराग पावन, तिलक कृत निजैमालके । नशत सकल कुअकै विधिकैरलिखित कर्म कपौलके ॥ प्रगट मन्त्र प्रत्यक्ष शामक, दक्षै विष अहि

१ खेल. २ डर. ३ मयकर. ४ नष्टकर्ता. ५ दुःखनाशकारि ६ आनंदित करना. ७ कामनारहित ८ रोगरहित. ९ थके हुए. १० दोष. ११ अनेक प्रकारको शक्ति. १२ त्याग. १३ विशेष मूर्खत. १४ हठ करके. १५ अत्यंत. १६ सर्प. १७ गडपक्षी. १८ आपका उपदेश. १९ कृपालु. २० बल्लूकल. बरदायक प्रभु. २१ संपूर्ण. २२ कल्याण. २३ उत्तम सुखरूप. भक्त २४ कमल सूर्य २५ कुबेर. २६ महादेव. २७ चरणकमल. २८ धूलि. २९ पूर्वकृतकर्मजन्म. ३० अत्यन्त बहादुरा रोग. ३१ अनुभव की हुई ३२ पवित्र औषधी. ३३ ज्ञानदायक. ३४ विघ्न. ३५ कल्प वृक्षके नवीन पत्रसमान. ३६ काति. ३७ प्रकाशित. ३८ दिशाओंके अन्तपर्यंत. ३९ अन्धकार समूहमाता. ४० उत्पन्न हुआ. ४१ कोमल. ४२ सुन्दर. ४३ किये. ४४ अपने मस्तक. ४५ दुःखको रेखा. ४६ ब्रह्मदेवके हाथको लिखी. ४७ मस्तक. ४८ प्रतिद. ४९ योग्य. कुशल. ५० सर्प.