कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
हौ, बांह गहीके लेव ॥ ७ ॥ नमो नमो गुरु देवजू, प्रणाम करौं अनन्त । तव कृपाते पाइहौं, भवसागरको अन्त ॥ ८ ॥ तुम सत्य पुरुष परमात्मा, पूरण विश्वा बीस । गुरु सत्य अविचल तुही, काहि नवाऊँ सीस ॥ ९ ॥ बन्दौं श्रीगुरुदेवजी, तुमही दीनदयाल । मैं अधीन विनती करूं, काटो यह भवजाल ॥ १० ॥ बन्दों गुरु तव चरणको, माँगूँ निर्मल बुद्धि । कालजालका भय बहु, लीजे मेरी शुद्धि ॥ ११ ॥ काल फँसायो जालमें, हरी ज्ञान अरु ध्यान । विनु कृपा सतगुरु तेरी, कैसे पाऊँ ज्ञान ॥ १२ ॥ बहु दुख अब भवमें सह्यो, भटकयो बहु जग आश । तुमहीं प्रभु दुःख हरन, दीजे ज्ञान विलास ॥ १३ ॥ आदिगुरु अदली तुही, तो विनु नहिं कछु ठौर । बहुविधि काल सताइया, सुनो हंस शिरमौर ॥ १४ ॥ आदिपुरुष अविचल तुही, चलाचली संसार ॥ १५ ॥ तुम विनु कैसे होइ हौं, चिन्ता रहित अचिन्त । अमर पदार्थ दीजिये, अमर नाम निश्चिन्त ॥ १६ ॥ कालक नगर विनाश है, क्षणमें जाइ नशाय । गुरु पुरुष कृपा करो, सार पदार्थ पाय ॥ १७ ॥ जाते भवबन्धन कटे, दीजो ज्ञान मुनींद । सत्य सुकृत कृपा करी, काटो कर्मकी विन्द ॥ १८ ॥ करुणामय करुणा करि, दीजे सत्य सुकाम । बन्दतहौं तव चरण प्रभु, सत्य गुरु सत्तनाम ॥ १९ ॥ तुम दाता हम मांगता, सत्य कवीर दयाल । पारख दे व्याधा हरो, मेटो यमको जाल ॥ २० ॥ किसी कामका हूँ नहीं, रहित ज्ञान अरु ध्यान । सत्य कवीर तुम कृपा करि, दीजो पारख ज्ञान ॥ २१ ॥ को हमको जगत यह, रंच न जानों भेव । सत्य कवीर दुख परहरू, पावों आत्म सेव ॥ २२ ॥ काल संधि झाई अहे, त्रय विधि कालक जाल । भेदवाक्य दीजे बता, सत्य कवीर दयाल ॥ २३ ॥ सत्य कवीरका बालका, पारख बिन