कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहै सो तो महा- नीच नरु है ॥ ११ ॥
घटत घटावत बढावत बढत विधु, क कलासेती त्योंही जगत व्यवहार यो । विवेक संबन्धिनि सुबुद्धि जासो कहैं कवि, रसके लहरिकी समूह सो रकारयो ॥ दशो द्वार घेरे पुनि छहु द्वार हेरे घनी, पेटि बीच टेरे निरेहूर दरबार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, तोरि तितुका सो जग होय भवपार यो ॥ १२ ॥
कर्म उद्धार जो सो ककार थिर चरमांझ, विधिहुकी मुक्ति सो पंथपार प्रमाण यो । रसनाके मूलमें पियूष सिन्धु राजे गाजे, निशिदिन बाजे विनु तार करता यो ॥ इन्द्री दशो घेरे दशो द्वार एक जोरि करि, त्रिकुटके मांझ हेरि गंगाजीकी धार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि दे स्वास तब दिसै सिर्जनहार यो ॥ १३ ॥
कलनकी कीर्ति सो कलेश बेलि खंडवेको, विपत्ति बिहंडवेको कहत प्रचंड यो । विविध विलास सत्य लोक आस पास मंद, हांसके प्रकाश कोटि भास करै दण्ड यो ॥ सोह रसवंत रस रूपको स्वरूप जानै, तानै जब सो कठिन करालको दण्ड यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरी, और और कहै ताको सुकृत बिहंड यो ॥ १४ ॥
करुणाको सागर उजागर है काया माझ, क्यों न धसि देखो अवरेखो दशों द्वार वो । विविध भावको विशारद है आठों याम, तजि धनधाम जो विचारे वार पार वो ॥ रमत रमावत रहत दिन रेनि ऐसे, जैसे परमान हैं झरोखाके मझार वो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै सो तो भूल्यो निज सार वो ॥ १५ ॥