भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(१६५)

उर धारिये । सुखके समुद्र माझ अचल बिहार जाको, चल न चित्त ताको अचंचल निहारिये ॥ रहस्य बताऊँ एक राजत अमरलोक, लखिके रकार तन मन धन वारिये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, कोरि सो अक्षर निछावर करि डारिये ॥ २० ॥

कक्षाको कल्याणको निधान खानि जानि लीजे, ववाते विहंगको स्वरूप उर ध्याइये । रहत निरन्तर निर्मल व्याधि खंडनको, विपत्ति विहंडनेको रंकार गाइये ॥ सोई निज साधु जाने निगम अगाध मतो, याहीको लखेते थिरताको पद पाइये । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै ताको सुख न दिखाइये ॥ २१ ॥

कलिके जे कर्म तिन्हैं करत विनाश कवि, छविको कमल फूले हियेमें किलकयो है । विमल सो निर्मल मन है ऐसे जैसे, मीन वारिधिमें चन्दको बलकयो है । राग अरु द्वेष सो विशोक है रकार मांझ, लखि सो तेज पुंज हृदयमें झलकयो है । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि तोरि तात बंक नालमें खिलकयो है ॥ २२ ॥

करुणा समुद्र माझ कहत जहाज जासो, सोई है ककार चढ़ि कयों न पार हूजिये । सत्त संधानहीको नाम विस्तार उरधारि, विविधि प्रकार धाय धाय वही धूजिये ॥ रचित रकार गुण नामको प्रमाण सब, है के कोकिला सजग बन मांझ कूजिये । ताहिते कहत है कवीर तीन अंक जोरि, मोरि चित्त डोरि तोरि जग पगु मूजिये ॥ २३ ॥

कहत कंक मणि सब पावन जासों कवि, ताहि वा ककारमें अनेक छवि छहरे । विगरे प्रपंच वाहि उपमा की आंचनि सो, फिर ढरि आवै रूपसागरकी लहरे । रसको समूह समाधान है