भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

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कौनके द्वारे॥६॥ धारी देह जीवन हितलागी, दै परचे अनेक उबारे॥७॥ तार भार दीन्ह तोहि पूरण क्षमा करो अपराध हमारे॥८॥८॥

शब्द ९-धन सतगुरु तुमरी बलिहारी ॥ मैं मति हीन छीन निज कर्मनि, दीन उधारन लीन उबारी ॥ टे० ॥ जिमि अंकुर तपे विलु बारी, ताकी अम्बुज सिद्ध खरारी ॥ आनिके वेगहिं लीन जगाई, नहीं तो परते भर्म बिगारी ॥ परम दयाल दयाके सागर, महाकष्ट दुख द्रन्द निवारी ॥ सदा रहत दासनके संगा, पूरण परखावत भर्म विकारी ॥ ४ ॥ ९ ॥

शब्द १०-मम बोहित तुम खेवनहारा । जग समुद्र अज्ञान भरचो जल, तृष्णा तरंग करत ललकारा ॥ टे० ॥ काम कोध जलजन्तु अपरबल, बैठा मगर भरि हंकारा॥१॥ मोह भर्म बिच आनि पराहूँ, सूझिपरे नहीं वारो पारा ॥२॥ बूडत नाव उबारो साहब, आदि अन्तके हो कड़िहारा ॥३॥ अशरण शरण विरद सम्भारो, पूरण आयो शरण तुम्हारा ॥ ४ ॥ १० ॥

शब्द ११-तुमीरहि दरसको बना हूँ भिखारी ॥ मधुकर इव सब फिरत जगतमें, कबधौ मिलौगे कमल सुखारी ॥ टेक ॥ काम कोध मद लोभ अपरबल, तृष्णा उठत लहरि अति भारी ॥ मन रात्यो नाना विषयनमें; इन्द्रिन बाट निपट मोरि पारी ॥ चित्त चंचल को समुझावे, खाँड छाड़ि फांकत है छारी ॥ गुरु विचार पर छिनहु रहत नहिं, जग अनित्य मां भई मतवारी ॥ ई नाना औगुन मोमें रहत है, मांगो दर्शन करि ढिठियारी ॥ जेहि हित मुनि जन योग करत हैं, त्यागि राज कुटुंब धन नारी ॥ पूरन एक भरोसो आवत हो प्रभु जीवनके हितकारी ॥ शरण आयको त्यागत नाही, बन्दीछोर विरद अति भारी ॥ ११ ॥

शब्द १२-मुझ लाचारके तुम रखवारी ॥ टे० ॥ नहिं मोहि