भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२५३)

किते पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥ ४ ॥

पिला पुर प्याला कर ऐ मेरे साकी । रहेगा नाम बन्दी छोर बाकी ॥ यह चक्की चल रही गरदून गरदाँ । जो खायो पीसकर सब नेक मुर्दा ॥ बले जाते हैं पीरोपीर दामाँ । हकीकत क्या वहाँ फरऊन धामाँ चर्खे चक्की है और सब जीव दाना । मियाँन मेख मुर्शिद मिहरबानाँ ॥ मियामे मेख मुर्शिदके कदमाँ लग । अलग बच जायगा मत हो हिरासाँ ॥ जिधर जावे उधर धर पीस डाले । जमीन और आसमाँ घर बन बियाबाँ ॥ पिये ब्रह्मा हरी हर कृष्ण राघो । पिये नौनाथ और जाहिद बुजुरगाँ ॥ बचे कोई न कर सदहा जो तदबीर । बचौपानी बनाया मेश गुरगाँ ॥ किया कब्जेमें सबके जिस्म व जाँ को । पड़ा पीछे कवी यह नफ़श शैताँ ॥ यह सब खिलकत खोरिश जमकी रोजीनः ॥ मलायक क्या परी और जिन्नोइन्साँ ॥ यह बैठा अकृपर सबके दिल भूत । जिधर चाहे उधर करदे परीशों ॥ जिधर यह भाग जावे आदमीजाद । चमकती सैफ हर जानिब नुमायाँ ॥ बले दन्दान जेरीं कालके सब । यह मुश्किल तुझ सिवा होवे न आसाँ ॥ वहाँ कैल मकाँ आजिजमुकीमाँ । तुही गफ़फ़ूर और तुही रहीमाँ ॥ ५ ॥

॥ तरजीआ बन्द ॥

ऐके दर परदये शुक्र गुफ़्तार । जल्द वह जलवः कोजिये इजहार ॥ सुझे वह जाम भर पिला साकी । मस्त हूँ तेरे इश्कमें सरशार ॥ हर तरफ़ लौलियान लछामा । इस्तलात इनका है अजाबुन्नार ॥ जाहिदोंके जहदमें मिलादे खाक । आबिदोंके न दिलमें सबों करार ॥ ओट तेरी बचाव चोट उनके । मैं हूँ इन्तहा व दुश्मनाने बकन्नार ॥ मंजिले दूर तोशए राह नहीं । मैं पियादा