भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(२६५)

शब्द सुरंगी बान । मेरा मारा फिर जिवै, हाथ न धहं कमान ॥ ८४ ॥ सतगुरु मारा बाण भारि, निरखि निरखि निज ठौर । राम अलखमें रमि रहा, चित्त न आवै और ॥ ८५ ॥ सतगुरु मारा प्रेमसुं, रही कटारो टूट । जैसी अनी न सालई, तैसी साजै मूट ॥ ८६ ॥ मान बडाई ऊरमी, यह जगका व्यवहार । दास गरीबी बन्दगी, सतगुरुका उपकार ॥ ८७ ॥ दिलहीमें दीदार है, बाद वहै संसार । सतगुरु शब्दका मसकला, सुझे दिखावनहार ॥ ८८ ॥ दीसै सो सब विनसि है, नाम धरे सो जाय । कहै कवीर सोइ सत्य है, सतगुरु दिया बताय ॥ ८९ ॥ कुदरत पाई खबर सों, सतगुरु दिया बताय । भँवर बिलम्बे कमलसे, अब कैसे उडिजाय ॥ ९० ॥ राम नाम छाई नहीं, सतगुरु सीख दिया । अविनाशीको परसिके, आतम अमर भया ॥ ९१ ॥ चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा माँहि । तेहि घर कैसा चाँदना, जेहि घर सतगुरु नाहि ॥ ९२ ॥ चित्त चोखा मन मसकला, बुधि उत्तम मति धीर । सो धोखा ना विरचई, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९३ ॥ कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार । सतगुरु मेला बाहिरे, दीसत घोर अँधार ॥ ९४ ॥ सतगुरु मोहिं निवाजिया, दीना अम्बर बोल । शीतल छाया सुगम फल, हँसा करे कलोल ॥ ९५ ॥ सतगुरु सत्य कवीर है, संकट परा हजीर । हाथ जोड़ विनती कहूं, भवसागरके तीर ॥ ९६ ॥ चित्त चोखा दिल निर्मला, दयावन्त गंभीर । सो धोखा विच क्यों रहै, सतगुरु मिलै कवीर ॥ ९७ ॥ ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास । सतगुरु मिलि एकै भया, रही न दूजी आस ॥ ९८ ॥ सतगुरु पारसके शिला, देखो सोच विचार । आई पडोसिन लै चली, दियो दिया सँवार ॥ ९९ ॥

१ कबीर सोइ तत्व गहो, सतगुरु दियो चैताय ।