कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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काहू कुटुम्ब सों चली, निसान बजाय ॥ चंद सूरकी पालकी, तेहि चढ वैठी नार । मुखमन संग सहेलरी, दुलहिन उतरी पार ॥ कमल जो फुले अकासमें, अलि गुंजे चहुँओर । पियाको लै वैठी तहाँ, डुरे सोहँगम चौर ॥ सोहँगम मूरत मोरे, हिरदे रही समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, सो लाजो दरसाय ॥ १३ ॥
दीहल आगन तान ।
पांच सखी संग दुलहिन, सासुर झगरा होय । ससुर चौर घर मुसही, कासों कहों दुख रोय ॥ वासर चंदा ऊगही, निस- कर ऊगे सूर । गंग जमुन दौय सम बहे, हंस गवन बड़ दूर ॥ गंग जमुनके अंतरे, परवत धोल सुजाव । चितवन नजर न आवई, जमको अमल अमान । ध्रुव मंडल नहिं दरसई, नेत्र गुंज अनुसार । चित गहि चेतो संतहो, मास परे जमधार ॥ स्वासा सुर नहीं बंदई, केहर बंदन लेय । आठे पाखके भीतरे, हंस पयाना देय ॥ कायापुर पाटन परचे, याका यही सुभाव । चितगहि चेतो कडिहारहो, औ घट लगे न नाव ॥ जैमुन लगन संभारहु, सुमिरन निर्गुन सार । पान छत्रपति साजहु, हंस उतारो पार ॥ पच्छिम लहर जुगावहु, पूरब चंदा तान । निर्गुन शब्द उचारहु, कबहुँ न होय जिव हान ॥ चंद उदय सुर आयवे, कूच नगारा होय । साहब कवीर कर दीहल, देखो शब्द विलोय ॥ १४ ॥ जुगत जान जुग बांधहु, चार पवन परवान । हंस हंस चलो बिहँसत, जम जीतो मैदान ॥ काल कठिन दुर्गदानी, हंसनके घटवार । तुरतहिं पार उतारई । जिन गहिले टकसार ॥ चौथे पवन जुग बंधना पवन बहतार डोर । हंस हंस चल सत्तपुर, उतरो घाट करोर ॥ दान मांगें जगातिया, ना रोके घटवार । जंबूद्वीप देव लेखा, परख परख टकसार ॥ भौजल नदिया भया- वना, सूझे वार न पार । अमित पवन वासा रहे, जिनरे गहल