कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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और दिसा चितवे नहीं, ऐसा सुरत वहि ओर ॥ शिव शक्ती जल अर्पई, गुरुके बचन प्रमान । जन्म सो अम्बर दुलहिन, जम जीतो मैदान ॥ सीस मटुकिया गहिलहु, सुक्ती देहि सुधार । साहब कवीर कहि दीहल, परख परख टकसार ॥ १८ ॥ गुंज-वरन जुग बांधहु, लगनहिं लगन विचार । निरखके पान सुधारहु, कबहुं न होवे द्वार ॥ दीप दीप जम बैठल, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ जम पाटन जे जीतले, तिनपर माँगे लेख । गुरुजी लगन सुधारहु, दिखलो जमहिं बिसेख ॥ अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर । सुर नर मुनि सब खायल, काल कठित बल जोर ॥ शेष सहस मुख विनवई, ब्रह्मा जमकी ओर । साहब कवीर कहि दीहल, लेख देखहु सोर ॥ १९ ॥ मनहिं आनंद दुलहिन, बिहँसत बोली बात । भौसागर बड संकट, चौदह लगी जगात ॥ प्रभुजी लगन विचारले, देखले जमहिं बिसेख । जिन जम पाटन परसिले, तिनपर माँगे लेख ॥ दीपन दीप जगातियां, पलक न लावे भोर । अमी बीज जिन बोयल, भये कालके चोर ॥ सुर नर मुनि सब अटके, काल कठिन बलजोर । शेष सहस मुख विनवही, ब्रह्मा जाके चोर ॥ साहब कवीर कहि दीहल, लेखा देव चुकाय । जमको मस्तक तोरके, अमे निसान बजाय ॥ २० ॥ बासर लगन विचारहु । कटे कर्मकी डोर । सुखसागर पहुंचावहु, जमसों तितुका टोर ॥ राज बरन होती कामनी, तासम होते कान्ह । कर्म काट दे भाँवर, जमकर मरदोमान ॥ चंद लगन चित चेतहु, उतरो भौजल पार । निरख परख गुरु परसिहौ, परख परख टकसार ॥ धरती रथ चढो कामनी, कटे कर्मके फंद । हंस हंस जुग बांधहु, अब जिव करहु अनंद ॥ सहतेजी शरनागती,