भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(३१३)

घाट । अनहद धुनि सुनि पाँचो मोहे, खुलिये ज्ञान कपाट ॥३॥ अजपा जाप जपे विनु जिभ्या, मूल मंत्र अवराधि । स्थिर ध्यान हठ आसन लागे, सहज समाधि ॥ ४ ॥ चांद सूर निसि वासर नहीं, नहिं तहां विद्यावेद । साहेब कवीर मिले सुखसागर, विरला पावे भेद ॥ ५ ॥ २१ ॥

आरति कीजे आतम पूजा । प्राण पुरुष सो अवर न दूजा ॥१॥ ज्ञान प्रकाश दीप उजियारा । घट घट देखो प्रान पियारा ॥२॥ भाव भक्ति कर और न भेवा । दया स्वरूपी करिले सेवा ॥ ३ ॥ सत संगति मिलि शब्द विराजे । धोखा द्रंद भर्म सब भाजे ॥४॥ काया नगर थिर होय भाई । आनन्द रूप सकल सुखदाई ॥५॥ शून्य ध्यान सबके मनमाना । तुम बैठो आतम अस्थाना ॥६॥ शब्द सुरति ले हृदय बसाओ । कपट क्रोधको दूर बहाओ ॥७॥ कहहि कवीर जिन रहनि सम्हारी । सदा आनंद रहते नर नारी ॥८॥ २२

सत स्वरूपकी आरति कीजे । साहब चीन्हि चरण चित दीजे ॥१॥ चिन्हों चिन्हों मन चित लाई । बिन चिन्हे कह जाओ भाई ॥२॥ जिह्व चिह्न तिन निर्मल अंगा । बिन चिह्न ते भये पतंगा ॥३॥ जब लग साहेब सो नहिं भेंटा । तब लग भाव भक्ति सब हेटा ॥४॥ शून्य सेज आरति करई । विबा कन्त का पूरी परई ॥ ५ ॥ भूषण पहिरो रूपकी रासी । फूलन सेज महलमें प्यासी ॥ ६ ॥ आरति लिये कन्तको जागे । पति विनु प्रेम कहो केहि लागे ॥७॥ केतिक पंडित मुनिजन योगी । केतिक नागे भक्त वियोगी ॥८॥ झूने झूने बहुत जमाती । बिन दुलहेकी कवन बराती ॥ ९ ॥ खोजो गगन शून्य ब्रह्मंडा । सात द्वीप पृथ्वी नव खंडा ॥ १० ॥ ग्रह माया तजि भये दिवाना । आप अपन पौ मर्म न जाना ॥११॥ जिनिके दूसर असरा नहीं । आपामध्ये आपहिं आहीं ॥१२॥ चेत चेत संशय कर दूरी । घटही माहिं संजीवन मूरी ॥ १३ ॥ साँचे सतगुरुकी बलिहारी । जिन यह कुंजी कुलफ उघारी ॥१४॥