कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 968 में से
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यकैरे ! ॥ दो दिनाका मिहँमान तूं, आय वस्यो यहि धाम । आखिर तेरा होगया, यहाँसे कूँच मुकाम । रहेगा फिर कहाँ तूं जायकैरे ! ॥ स्वारथके साथी सभी सभी लोक कुटुम परिवार । अन्तसमय नहीं जायगा, कोई तेरे लार । घरसे डरेंगे बाहर उठायकैरे ! ॥ कहैं कवीर समुझायकै, सुन मूरख नादान । सीधे मारग जगत्वमें, चलतूंतजि अभिमान । साधु सन्तोसे शीश नवायकैरे ॥ २ ॥
दुमरी ध्वनि काकी.
पास खड़ा तेरे नजर न आवे, महँबूब पियारा वे ॥ टे० ॥ घट २ व्यापक सबकी जानै, रहे सबनसे न्यारा वे । दूंद २ कोह खोज न पायो, सब जग हारा वे ॥ स्मर्ण ध्यान योग संयम व्रत, नेम अचारा वे ॥ जाके हेत करत सुर नर मुनि, विविध प्रकारा वे ॥ वेद पुराण भागवत गीता, बहोत विचारा वे ॥ सबी अपार अगम्य अगोचर, अलख पुकारा वे ॥ छोड़िकै जिन अज्ञान कल्पना कुमति निवारा वे ॥ मिला कवीर तिन्हे दिल अन्दर, सिरजन हारा वे ॥ १ ॥
तुम कौन हो मियाँ कहाँके ? ॥ टे० ॥ कहाँसे आये, कहाँ जावोगे ?, किसे हाल अपना सुनावोगे ?, किसने भेजा, कौन काम है, नई नगरिया झाँके ॥ आते तुमने रोय दिया है, क्या लाये सो खोय दिया है ? । कौन जिकर किस फिकरमें, आँखे खोले हो के टाँके ? ॥ वतैन तुम्हारा कौन ठाम है ?, बड़ा सहर या कोई गौम है ? पूरव पश्चिम उत्तर दक्षिण, नैरित वायु ईशाँके ॥ आये हो जो इस नगरीमें, दया धरम कुछ राखो जीमें, अब ऐसी मत कीजो जिसमें, यहाँके न हो न वहाँके ॥ हिंदू हो या मुमल- मान हो ?, दाँना या बिलकुल नदाँन हो ?, कहैं कवीर कहौ कुछ हमसे, तिरछे हो के बाँके ॥ २ ॥
१ पाहुना. २ प्रयाण, जाना. ३ साथ. ४ प्रिय. ५ पूर्ण. ६ निवारन किया, लगाया, नाश किया. ७ देखा. ८ स्मरण. ९ चिन्ता. १० बंद किये. ११ जन्म स्थान. १२ ईशान कोण. १३ बुद्धिमान. १४ मूर्ख.