कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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ज्ञानी, बहुविध करि अनरीत ॥ सुनै न एक सीख काहुकी, गावै अपनीहि गीत । कहैं कवीर डरे यह तिनसे, जिनकी गुरुसे प्रीत ॥२॥
जगतमें तो सम कौन अनारी । चहत बुझावैन काम अग्निको, विषय भोग घृत डारी ॥ ८० ॥ रह्यो सदा झूठे झगरनमें, शठ प्रभुनाम विसारी । खायो पियो अघाय पेट भरी, सोयो पांव पसारी ॥ तृष्णाके वश भटकत डोल्यो, निशिवासर झख मारी । छल परंपंच कपट फैलावत, उमर गँवाई सारी ॥ कबहुँ न सुमति आनि उर तनकहु, देख्यो आँखि उधारी । अन्त समय यमदूत आयकै, का गति करहि हमारी ॥ अजहुँ मानु सीख सन्तनकी, भाव भक्ति उरधारी । गहु गुरु शरण तरण भवसागर, कहैं कवीर पुकारी ॥ ३ ॥
समय यह नीको बीतयो जात । पल २ क्षण २ घरी पहर होय, दिवस सांझ परभात ॥ ८० ॥ फूटे घट जिमि वारि आयु तिमि, क्षीण होत दिनरात । तापर जरा वाघिनीके सम, आवत है अकुलात ॥ विविध प्रकार रोग शत्रुगण, मारि २ कै लात । करत प्रहार वज्र जिमि तनपर, यहि नाना उत्पात ॥ मुखमें दांत रहै नहि एकहु, शिथिल होय सब गात । देखि न परै नयनसे मारग, तृष्णा तहुँ न बुढात ॥ कहैं कवीर सुनौ भाई साधो, एक हमारी बात । मन वच सत्यनाम आराधो, जो चाहो कुशलतात ॥ ४ ॥
कृपानिधि अब तौ मोहि तँन हेरो । तुम विन कौन और है जगमें, नाथ सहायक मेरो ॥ ८० ॥ भटकत फिरत दुष्ट मन इत उत, जैसे अललंबछेरो । उर सन्तोष करब नहि पावत, एक पल आय वंसेरो ॥ कुमति प्रबल होय लरति सुमतिसे, करि घट मांहि
१ भूख. २ शीतल करना. ३ जल. ४ मारना, बार करना ५ डीला. ६ कल्याण. ७ मेरी तरफ देखो.
८ जिसको लगाम नहीं चढ़ाई गई ऐसा घोड़ेका बच्चा ९ निवास.