कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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गुरु कर नाऊँ । शब्दहि भेद मैं तोहि बताऊँ ॥ २ ॥ विना योग न मिटै जिव फेरा । सतगुरु शब्द कहै जिव टेरा ॥ गुरुके शब्द सुरति जब जूटे । तवहीं काल ठगौरी छूटे ॥ ३ ॥ संशय मिटै योगके धारे । धर्मनि तुम मन करौ विचारे ॥ शब्द सुरति योग यह जानो । गुरुके शब्द सुरत ठहरानो ॥ ४ ॥ गुरु शब्द निश्चय जब होई । छूटे काल जाल निज सोई ॥ संशयको खण्डन यह योगा । ता सम आहि न दूसर भोगा ॥ ५ ॥ जीवन काज जाहिते होई । सोई जतन करो सब कोई ॥ सब जिव होई न एक समाना । कर्महि योग अधिकार पिछाना ॥ ६ ॥ जस अधिकार जाहि कर होई । तैसे माने शब्द बिलोई ॥ चौका आरति सबहि बतावे । अपन पराइट भेद लखावे ॥ ७ ॥
चौका आरति जो लखे, ज्ञानी मूढ प्रवीन ।
सतगुरु भेद बतावई, पावे अम्बर चीन ॥ ७ ॥
चौका आरति भेद बतावे । जेहि समझे तेहि लोक पठावे ॥ जैसी रचना लोक विचारा । घटके भीतर सबहि सँवारा ॥ १ ॥ घटका भेद गुरु पहिचाने । चौका आरति सबहि विधाने ॥ चौका आरति जो कोइ बूझे । काल दयाल सब तेहि सूझे ॥ २ ॥ ज्ञान कर्म औ योग विचारा । चौका महाँ सबही विस्तारा ॥ सत्य लोक औ काल पसारा । सबहीं भेद किया निरुआरा ॥ ३ ॥ भक्ति उपासन निज कर राखा । जेहि समझे फल मुक्ति चाखा ॥ अगम अलख सब गुरु समझावे । सुरति निरति ते दर्शन पावे ॥ ४ ॥ शब्द परतीत देख सत लोका । गुरुकी दया मिटै सब धोखा ॥ एके सुरति निरति जो धारे । गुरु परतापसो लोक सिधारे ॥ ५ ॥ यहि निहतत्व मता जो धारे । सुरति निरति सो दीप निहारे ॥ घटमें चौका कर उजियारा । पल पल निरखे सतगुरु द्वारा ॥ ६ ॥