भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

कमाई । भक्ति कमाय भक्त कहाई ॥ भक्त कहाइके रहै उदासा । सत्य गुरु मिलै सत्य विश्वासा ॥ ९ ॥ सतगुरु मिलै तो संशय भागे । सो फिरि बहुरि अंक नहीं लागे ॥ सतगुरु सुख संतोषके नायक । परमारथ सो सदा सहायक ॥ १० ॥ सतगुरु पाय दुसर घर नाही । आवागमन रहित घर जाहीं ॥ कहैं कवीर सत्य करि माने । साधु गुरु नहीं अन्तर जाने ॥ ११ ॥

सा०-साधु बड़े परमार्थी, चन ज्यों बरषे आय । तपन बुझावैं औरकी, अपनो पारस लाय ॥

रमनी-वैरागी (साधु) रहनी ॥

वैरागी उनमुन घर करई । हर्ष शोक कछु चित्त न धरई ॥ रुखा सूखा करै अहारा । निसि दिन आतम तत्त्व सम्हारा ॥ १ ॥ विकसित बदन भजनके आगर । शीतल सदा प्रेम सुखसागर ॥ रहिता रहै बहै नहीं कबहीं । सो वैरागी पावे हमहीं ॥ २ ॥ हमें पाय हमहीं अस होई । आवागमन मिटावे सोई ॥ आवा-गमन मिटावै काई । रहैं अधीन तत्त्व समाई ॥ ३ ॥ काया धरि काया कहैं बोधे । आवागमन रहित तत सोधे ॥ जीवत मरे मरे पुनि जीवैं । उनमुनि बसे महा रस पीवैं ॥ ४ ॥ महाशून्यमो रहै समाई । मरै न जिवे आवे न जाई ॥ ऐसी विधि वैरागी सोई । हम मिलि रहै हमहि अस होई ॥ ५ ॥ भीतर रहनी कहा बनायी । बाहर रहनी देहुँ बतायी ॥ वैरागी आसन दृढ होई । रहै अजाँच जाँचे नहीं कोई ॥ ६ ॥ वैरागी अस चाल चलावे । तजै अखज तव हंस कहावे ॥ मद्य मांसके निकट न जाई । करै अहार सो काल कसाई ॥ ७ ॥ प्रेम भक्ति आने उर माहीं । द्रोह घात दिसि चित्तवै नाही ॥ जीव दया राखे हिय जानी । मन वच कर्म घात नहीं आनी ॥ ८ ॥ हंस दशा धरि पंथ चलावे । श्रवनि कण्ठी तिलक लगावे ॥ क्रोध