भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

पूँछल महतारी । को तोर पुरुष तू काकरि नारी ॥४॥ तुम हम हम तुम और न कोई । तुमहिं मोर पुरुष हमहिं तोर जोई ॥२॥

सा०-बाप पूतकी एकै नारी, एकै माय बिआय ।

ऐसा पूत सपूत न देख्यो, बापै चीन्है धाय ॥ २ ॥

तीसरो रमैनी ३ ॥

प्रथम अरंभ कौनके भयऊ । दूसर प्रकट कौन सो ठयऊ ॥१॥

प्रकटे ब्रह्मा विष्णु शिव शक्ती । प्रथमै भक्ति कीन जिव उक्ती ॥२॥

प्रकटे पवन पानी औ छाया । बहु बिस्तारकै प्रकटी माया ॥३॥

प्रकटे अंड पिंड ब्रह्मण्डा । पृथिवी प्रकट कीन नवरंढा ॥४॥

प्रकटे सिध साधक संन्यासी । ये सब लागि रहे अविनासी ॥५॥

प्रकटे सुरनर सुनि सब झारी । तेऊ खोजि परे सब हारी ॥६॥

सा०-जीव सीव प्रकटे सबै, वे ठाकुर सब दास ।

कविर और जाने नहीं, एक रामनामकी आस ॥ ३ ॥

चौथी रमैनी ४॥

प्रथम चरण गुरु कीन बिचारा । करता गावै सिरजनहारा ॥१॥

कहै करिकै जग बौराया । शक्ति भक्ति लै बांधिनि माया ॥२॥

अद्भुत रूप जातिकी वानी । उपजी प्रीति रमैनी ठानी ॥३॥

गुणि अनगुणी अर्थ नहिं आया । बहुतक जने चीन्ह नहिं पाया

॥४॥ जो चीन्है तेहि निर्मल अंगा । अनचीन्है नल भये पतंगा ॥४॥

सा०-चीन्हि चीन्हि कह गावहू, बानी परी न चीन्हि ।

आदि अंत उत्पति प्रलय, सब आपुहि कहि दीन्हि ॥४॥

पांचवी रमैनी ५॥

कहैलौ कहौ जुगनकी बाता । भूले ब्रह्म न चीन्है ज्ञाता ॥१॥

हरिहर ब्रह्माके मन भाई । बिबि अक्षर लै जुगति बनाई ॥२॥

बिबि अच्छरका कीन बैधाना । अनहद शब्द ज्योति परमाना ॥३॥

अच्छर पठि गुनि राह चलाई । सनक सनन्दनके मन भाई ॥४॥