कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
रमैनी पद्मासवी ५० ॥
कह इत मोहिं भयल जुग चारी । समझत नाहीं मोहि सुत नारी ॥ बंस आग लगी बंसै जरिया । अम भुलाय नर धंघे परि्या ॥ हस्तीके फन्दे हस्ती रहई । मृगीके फन्दे मृगा परई ॥ लोहै लोह काटु जस आना । तियाके तत्व तिया पहिचाना ॥५०॥
सा०—नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नारि ।
पुरुषहि पुरुषा जो रचे, ते बिरले संसार ॥ ५० ॥
रमैनी इत्यावनवी ॥ ५१ ॥
जाकर नाम अकहुआ भाई । ताकर कहा रमैनी गाई ॥ कहैको तातपर्य है ऐसा । जस पंथी वोहित चढि वैसा ॥ है कछु रहनि गहनिकी बाता । बैठा रहै चला पुनि जाता ॥ रहै बदन नहिं स्वांग सुभाऊ । मन अस्थिर नहिं बीलै काऊ ॥ ५१ ॥
सा०—तन रहते मन जात है, मन रहते तन जाय ।
तन मन एकै है रहै, हंस कवीर कहाय ॥ ५१ ॥
रमैनी वावनवी ५२ ॥
जेहि कारन शिव अजहुँ वियोगी । अंग बिभूति लायभै जोगी ॥ सेष सहस मुख पार न पावै । सो अब खसम सहित समुझावै ॥ ऐसी विधि जो मो कहँ धावै । छठयें मास दरस जो पावै ॥ कौनेहु भांति दिखाई देऊँ । गुप्तहि रहौं सुभाव सब लेऊँ ॥५२॥
सा०—कहहिं कवीर पुकारिके, सबका उहै हवाल ।
कहा हमार मानै नहीं, किमि छूटै भ्रमजाल ॥ ५२ ॥
रमैनी तिरपनवी ५३ ॥
महादेव मुनि अन्त न पाया । उमा सहित उन जन्म गंवाया ॥ उनहुते सिद्ध साधक होई । मन निश्चै कहु कैसे कोई ॥ जब लग तनयै आहै सोई । तब लग चेत न देखो कोई ॥ तब चेतिहो जब तजिहो प्राना । भया अन्त तब मन पछताना ॥ इतना सुनत निकट चलि आई । मनके विकार न छूटे भाई ॥
१ उनसे सिद्ध साधक नहिं कोई । मन निश्चय कहु कैसे होई ।