कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमनी यकसठबी ॥ ६१ ॥
धर्म कथा जो कहते रहई । लबरी नित उठि प्राते कहई ॥ लबरि विहाने लबरी संझा । एक लाबरि वस द्विदया मांझा ॥ रामहु केर मर्म नहि जाना । ले मति ठानी वेद पुराना ॥ वेदहु केर कहा नहि करई । जरते रहे मुस्त नहि परई ॥
सा०-गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ।
माटी तन माटी मिलो, पवनहि पवन समाय ॥ ६१ ॥
रमनी वासठबी ॥ ६२ ॥
जो तोहि करता बरण विचारा । जनमत तीन दण्ड अनुसारा ॥ जनमत शूद्र सुये पुनि शूद्रा । कृत्रिम जनेउ घालि जग दुंद्रा ॥ जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मणी जाये । और राह तुम काहे न आये ॥ जो तुम तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काहे न सुनति कराये ॥ कारी पीरी दूहौ गई । ताकर दूध देहु बिलगाई ॥ छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कवीर भजु शारंगपानी ॥ ६२ ॥
रमनी तिरसठबी ॥ ६३ ॥
नाना रूप बरण यक कीन्हा । चारि वरण वै काहु न चीन्हा ॥ नष्ट गये कर्ता नहि चीन्हा । नष्ट गये औरहि मन दीन्हा ॥ नष्ट गये जिन वेद बखाना । वेद पठै पै भेद न जाना ॥ विमल्लख करै नैन नहि सूझा । भौ अजान तब कछुव न बूझा ॥
सा०-नाना नाच नचाइके, नाचे नटके भेष ।
घटघटमें अविनाशी बसै, सुनहु तंकी तुम सेष ॥ ६३ ॥
रमनी चौसठबी ॥ ६४ ॥
काया कंचन जतन कराया । बहुत भांतिके मन पलटाया ॥ जो सौ बार कहौ समुझाई । तहिबो धरा छोडि नहि जाई ॥ जनके कहे जो जन रहि जाई । नव निधि सिधि तिन्ह पाई ॥ सदा धर्म तेहि द्विदया बसई । राम कसौटी कसते रहई ॥ जोरि कसावै अन्ते जाई । सो बाउर आपुहि बौराई ॥
कबीरपंथी शब्दावली १६