कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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छूटे की काहु न जानी ॥ २३ ॥ घटकी किया रहनि रहाई । कालहुते तिनहु डहकाई ॥
सा०-बन्दिछोर मम शब्द है, काटे जमके बन्द ॥ लैराखे सतलोकमें, चले काल कटि फन्द ॥ २ ॥ ऐसे कारजको शब्द है, जो तोड़े कुलकान ॥ लै राखे सतलोकमें, करै शब्द पहि- चान ॥ ३ ॥ शब्द हमारा जो लहै, चले न जमका जोर ॥ काले मारे छय करै, हंसा पहुँचै ओर ॥ ४ ॥ सतलोकमें पहुँ- चिया, अमरित भोजन पाइ ॥ जोग जुगंतर रम रहै, कहैं कवीर समझाइ ॥ ५ ॥
रमैनी-यह दुनिया झूठे रंगराची । झूठौ उपाई करे कर नाची ॥ २४ ॥ झूठेसे परतीत कराई । ताते सृष्टी काल सुख जाई ॥ कालक काहु मरम न पावा । काल सबन मिल खसम दिठावा ॥ २५ ॥ काल रूप बरते घट मांही । काल लगन नर आवै जाहीं ॥ काल सबनपै भेष धरावै । कालक दीन सिमरफल पावै ॥ २६ ॥ सो फल चाखै हुआ उड़ावे । हाथ पिछौरै शीश डुलावै ॥ सेवा कर पंछी पछताई । ऐसे जीव काल सुख जाई ॥ २७ ॥ अस जिन जानौ पंछि भुलाना । जनम हार जग जिय पछताना ॥ शब्द हमारे जो फल होई । सो फल कालसु माँगौ लौई ॥ २८ ॥ कहौ काल कहाँते देई । नंगक आस धोवि का लेई ॥ ऐसे कर कर जग डहकावा । जैसे आगी वनधौं लावा ॥ २९ ॥ अस इन लोगन घर मत कीना । घरके मते अपन पौं लीना ॥ जैसे नाद सो भ्रिग भुलाई । समुझे नहीं पारधि दुखदाई ॥ ३० ॥ नाद सुनाइ प्रान हत कीनौ । ऐसे काल जीव हत कीनौ ॥ ज्यों जल मध्ये मीन रहाई । निसवासर आपनौ भछ खाई ॥ ३१ ॥ तहाँ पारधी बंशी लाई । गेंडुआ चार तहाँ लटकाई ॥ मीन न