कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
ससा-सस्सा सरा रच्यो वरियाई । सर बेघे सब लोग तवाई ॥ सस्साके घर सुन गुन होई । इतनी बात न जाने कोई ॥३२॥
हहा-हहहा हाय हायमें सब जग जाई । हरष सोक सब मांहि समाई ॥ हकरि हकरि सब बड बड गयऊ ॥ हहहा मर्म न काहू पयऊ ॥ ३३ ॥
क्षक्षा-छछछा छण प्रलय मिटि जाई । छेव परे तब को समुझाई ॥ छेव परे कोउ अन्त न पाया । कह कवीर अगमन गोह- राया ॥ ३४ ॥
इति चौतीसा बीजकका सम्पूर्ण ॥
अथ विप्रमतीसी प्रारम्भः ॥
सुनहु सबन मिलि विप्र मतीसी । हरि विनु बूड़ी नाव भरीसी ॥ ॥१॥ ब्राह्मण होयके ब्रह्म न जाने । घरमें जग्य प्रतिग्रह आने ॥२॥ जो सिरजा तेहि नहिं पहिचानै । करम भरम लै बैठि बखानै ॥ ३ ॥ ग्रहण अमावस सायर पूजा । स्वातिके पात परहिं जनि दूजा ॥४॥ प्रेत कर्म मुख अंतर बासा । आहुति सहित होमकी आसा ॥५॥ कुल उत्तम कुल माहि कहावे । फिरि फिरि मध्यम कर्म करावे ॥ ६ ॥ करम असुचि उछिछे खाहीं । मति भरिष्ट जमलोकहिं जाहीं ॥ ७ ॥ सुत दारा मिलि जूठा खाहीं । हरि भगतनकी छूत कराहीं ॥ ८ ॥ नहाय खोरि उत्तम है आवे । विष्णुभक्त देखे दुख पावे ॥ ९ ॥ स्वारथ लागि रहे वे आढा । नाम लेत जस पावक डाढा ॥१०॥ राम किन्नकी छोडिन आसा । पठि गुनिभै किरतिमके दासा ॥ ११ ॥ करम करहि करमहिको धावे । जो पूछे तेहि करम हढावै ॥ १२ ॥ निःकरमीकी निंदा करई । कर्म करे ताही चित धरई ॥ १३ ॥ अस हिय भगति