भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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भूमिका

(३)

सत्य असत्यके मापको, शब्दकीन आधार । मुक्तामनि सोई अहै, जाने जाननहार ॥ १६ ॥ विना शब्द अन्धे भये, सूक्ष्म वाट ना बाट । काल जाल अरुझाइके, पड़े जगतके ठाट ॥ १७ ॥ ठाट वाटमें जगतके, भूले सत्य सुराह । गुरु छाड़ि गुरुवा गहै, कौन कहै अवगाह ॥ १८ ॥ गुरुवा रूप जगत धरी, काल फँसावे जीव । पक्षवादमें डालिके, सत्य छुडावे पीव ॥ १९ ॥ सत्य छाड़ि असत गहि, सत औगुनकी खान । शब्द विना परखे नहीं, पावे दुःख निदान ॥ २० ॥ दुःख मिटावन कारने, सत कवीर कहि दीन । शब्द रूप मैं जगतमें, डोलों सदा परवीन ॥ २१ ॥ शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लेहु । सार शब्द गरहन करी, त्याग असारको देहु ॥ २२ ॥ शब्द विनु सुरति आंधरी, कहू कहाँ को जाय । द्वार न पावे शब्द को, फिरि फिरि भटका खाय ॥ २३ ॥ शब्द हमारा आदिका, सुनि मति जाहु सरखि । जो चाहो निज तत्वको, शब्दे लेहु परखि ॥ २४ ॥ शब्दे मारा गिरपडा, शब्दे छाडा राज । जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सँवैरा काज ॥ २५ ॥ शब्द कहै सो कीजिये, गुरुवा बडे लबार । अपने अपने स्वार्थको, ठौर ठौर बटमार ॥ २६ ॥ ताते धर्मनि कर परचारा । विना शब्द नहीं जीव उवारा । शब्द गहे सो पंथ चलावे । विना शब्द नहि सत्य लखावे ॥ शब्द गहे सो भवजल पारा । विना शब्द बूडे मँझधारा ॥ ताते वंशन देहु चिताई । जो चाहैं निज हित वह भाई ॥ शब्द हुकुम नहि टारें कबहीं । आनन्द राज सुख विलसैं तबहीं ॥ कहैं लगि कहों सुनो धर्मदासा । आगम भेद कियो परगासा ॥

(आगम संदेश)