कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 722, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७०८)
कवीरपंथी-
साधो उपज्यो न केवल ज्ञान ॥ टेक ॥ कबहुँक बन चर तुम भये हो । कबहुँक तिन चर रूप ॥ कबहुँक सिंह दहारत वनमें । कबहुँक मीड़क कूप ॥ कबहुँक नरपति तुम भए हो । कबहुँक मांगत भीख ॥ कबहुँक गज होय घूमंत डोले । कबहुँक मस्तक लीख ॥ कबहुँक विकत तुम भयो हो । कबहुँक गये फँदे जंगल ॥ कबहुँक उड़िकै गये गगनकूँ । कबहुँ गये पाताल ॥ कबहुँक सुरपति तुम भये है । कबहुँक नरक निदान ॥ कहै कवीर ऐसे भरम डोले । जैसे सूकर स्वान ॥
धमार १५-ऐसे पिया संग होरी खेलिये हो । अहा मेरो साधो सुरति सुहागिन नारि ॥ टेक ॥ पांच पचीस सखियनकी संगति तत मत सखी लिया साथ ॥ अरस परस पियाके संग राची । सहज लकुटिया हाथ ॥ गगन मंडलमें होत कुलाहल । उठत राग अनुराग ॥ बाजत ताल मृदंग झांझि डफ । बहु विधि भयो सुहाग ॥ ग्यान गुलाल अनहद अरगजा । चित चोवां मन लाय ॥ कर-करनी केशरि रंग भीनी । विन रसना गुन गाथ ॥ धन सतगुरु धन साधुकी संगति । धन हमारे भाग ॥ सांची फाग भगति सतगुरुकी । कहै कवीर सुहाग ॥
धमार १६-अभि अंतर अनहद सुरली बाजे । अहो मेरो साधो चलो न देखन जाय ॥ टेक ॥ काया कुंज गली वृन्दावन । अनुभव जमुना नीर बैन वजाई बीचमें मोहन नाभि कमलके तीर ॥ सुधि बुधि विसार गई सब श्यामा । सुनि सुरलीकी टेरे ॥ उलटी सिंगार कियो है आतम । पहरचो है अम्बर फेर ॥ सुरलीको शब्द सुनत सब गोपी । भूलि गई परिवार ॥ पांच पचीस ॥ सखी संग राधो । भेटन चली है सुरार ॥ आस पास गोपियनको मंडप । विचि विचि परमानन्द ॥ भयो उछाह प्रेम अति