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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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पृष्ठ 724

(७१०)

कवीरपंथी—

अनुराग । अपने पियाके दरशन पाऊँ, पूरन प्रेम सुहाग ॥ सत-गुरु फगुवा पाइया हो, मारग दियो बताय । कहैं कवीर जो यह तत्त्व पावे, सो जन लोकहि जाय ॥

धमार १९—अहो साहब संग होरी खेलिये हो ॥ हो भाई साधो हो खेलो तन मन वार ॥ टेक ॥ धोखेकी एक होरी बनाई, भवको डाँढो गाड़ । दुबधा की जार लाय इत उतसों, लब्बाको देउंगी जार ॥ प्रेम पावक ले होरी दागों, कर्म बरूला डार । भावर दे दे मंगल गावों, त्रिगुण फंद निरवार ॥ ससुझकी झोरी सुमतिने पकरी, होरीकी भस्म लई झार । जित कित धूर उड़ाय जगत पै, कुल पर डारोंगी छार ॥ करनी को केशर घटमें घोरों, रहन करो पिचकार । परख पतंगके रङ्ग उतारों, देउंगी मन पर डार ॥ दया अबीर गुलाल धर्म कर, चित चंदन लेह गार । सतगुरु मुख पर डारों, प्रीतिसों, पाँचौ चोरन मार ॥ जो कछु चाल होय गुरु सप्रथ, पहिले देहु तिस्वार । आमिनकी बिनती सुन साहब, फगुवा देहु हमार ॥ कहैं कवीर सुन धर्मनि नागर, अब है राह बिचार । अमी अंक परवाना पावै, पहुंचे पुरुष दुआर ॥

धमार २०—अहो बैरागी नागर होरी खेलिये हो हो ॥ हो भाई साधो हो, खेलो निरगुन नाह ॥ गढ बांधोंमें चाचर खेलै, निरगुन नाम विचार । संगन सनेह, हंस परबोधो, जमसो जीव उबार ॥ सूर सनेह गहो निशि बासर, सुषुप्त वेद टकसार । निरगुन नाम निअच्छर गावो, जुग जुग शब्द पुकार ॥ मंदिर-सों निकसी एक सुंदर, कर पग शीश न छंद । बिन नेनन देखिये वाकी सुरत, दिन दिन परम अनंद ॥ बिन जुगबंध काल छोड़े, बहु विधी भेष बनाय । जब लग जमकों चिरे न कागद,