कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 726, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७१२)
कवीरपंथी-
आये, छांड़ छांड़ बैराग ॥ सात द्रौप नौ खंड तिहुंपुर, सो सो फगुवा लीन्ह । साहब कवीरसों अरजी करत हैं, तुम मोहिं कछू न दीन्ह ॥ ६ ॥
धमार २३—अहो गुरुगम सों होरी खेलिय हो हो ॥ हो भाई साधो हो शब्द सुरति लौ लाय ॥ टेक ॥ कोई एक नाम निरंजन ध्यावे, कोई कहे निरधार । जोत सुरूपी अलख कहत है, राँचि रहौ संसार ॥ कोई दुर्गा शिवको जाने, कोई जाने भूत । कोई यंत्र मंत्रसों राचे, मूल विसारो सूत ॥ कोईक नवली कर्महिं साधे, पवना देह चढाय । बिंदहिं साध भगन होय फूले, सतगुरु शब्द न पाय ॥ अजपा सुन्न जपे सब कोई, छर अच्छर लग दौर । मारग भूल फिरे भटकाना, मन आवत नहिं ठौर ॥ कोई ओहं कोई सोहं ध्यावे, कोई एक नहिं ठहराय । घटमें ज्ञान कथे सब ज्ञानी, तन छूटे कहं जाय ॥ पूरन ब्रह्म कहे सब कोई, सो जग करे अहार । तन छूटे कहु मिले ब्रह्मको, जनम जु होत खुवार ॥ ऊर्ध तपे बन खण्ड जात है, खात वृच्छके पात । जोगी जंगम औ दरवेसा, भेष धरे संसात ॥ कथनी बकनी पार न पावे, सतगुरु शब्द अकाल । अच्छरमें निःअच्छर दरशे, सतगुरु होहिं दयाल ॥ युक्ति जान खेले जो कोई, शब्द डोर चढ जाय । अमर लोकमें पुरुष विदेही, सत कवीर लौ लाय ॥ ७ ॥
धमार २४—अहो कोई नाम रंगीला सतसंगी हो हो ॥ हो भाई साधो हो गहो शब्द टकसार ॥ टेक ॥ प्रेमसो गगन पखावज बाजे, बिन कर बाजे ताल । रुनक झुनक अनहद धुनि बाजे, उठत छतीसों राग ॥ अरुन बरुन गुलाल बहुरंग । बहुरूपी पांचौ राव । इन पांचौं विश्वास न लीन्ह, खेले त्रिकुटी भाव ॥ प्रेमके रंग सींचत रहै, अष्ट कमल परकास । ज्ञान गली छूटे पिचकारी,