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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

(७१४)

कवीरपंथी—

तपी संन्यासी, दिगंबर दरबेस । सनक सनंदन सबही बांधे, काहु न पायो भेश ॥ तेंतिस कोटि देवता बांधे, माया रसरी डार । कहैं कवीर तेई जन बांचे, चीन्हा शब्द हमार ॥

शब्द चाचर ।

चाचर मची अब हो हो खेल जिन चाचर माहीं ॥ टेक ॥ चाचर खेलें दोय जने एक मन औ माया । पंथ चलन नहिं पावै बहु द्रन्द्व मचाय ॥ लोभ मोहकी पिचकारी मारो चतुरा ज्ञानी । सुर नर सुनि सबही छले जेते अभिमानी ॥ डफ कपटही बाजे सही बहु जग भरमाई । तृष्णा लागे खेलई सम्हरा नहीं कोई ॥ काम क्रोधकी अरगजा सब अंग लगीई । आशा तो चहुँ दिशि फिरे सब सुधि बुधि खोई ॥ नाना रंग बनायके नाचे मन माया । ठांव ठांव फंदा रचे कोई जान न पाया ॥ अंग अनेक दिखायके सबही जग खाया । मचे खेलके आंधरे काहु मरम न पाया ॥ षट् दरशन सब खेलहीं बहु भेष बनाई । मन रंगीके खेलमें सबही बिलमाई ॥ पंडित वेद पुरानको पढ पढ अरथावैं । शेष सहस मुख गावहीं कछु भेद न पावैं ॥ तीर्थ व्रत जग लागिया धावै चहुँ ओरा । देवी देवल देवता खेलैं सब ठौरा ॥ सुख संपतिके कारने अरुझा सब कोई । अंतकाल औसर परे कोई संग न होई ॥ पछा पछी सब खेलहा बहु भरम झुलाने । वार पारकी सुधि नहीं कथनी लपटाने ॥ जाके जो कछु मन बसे वह वाही माने । सत शब्द चीन्हें नहीं बहु झगरा ठाने ॥ सांचेको माने नहीं जिह्वाके लपटी । वादिनकी कछु सुधि नहीं जम मारे झपटी ॥ मन मायाके रंगमें सबही ये भूले । चौरासीके खेलमें सदा जोनी झूले ॥ सतगुरु शब्द पुकारिया खेलै जो कोई । भौसागरके भय नहीं फिर