भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६७)

सो प्रगटे गुरु रूप, सो हंस उबारन् ॥ सतगुरु चरण सरोज, जे जन मन ध्यावहीं । जरा मरण दुख नाशि, अचल चर पावहीं ॥ २ ॥

दया श्रुको ।

अथ संज्ञापाठ ।

गुरुस्तुति (बुद्धान पुत्री)

दोहा-नमो नमो गुरु देवजु, साधु स्वरूपी देव । आदि अंत गुण कालके, जाननहारे भेव ॥ १ ॥

सोरठा-मेटेउ कालको जाल, ताते गुरु तुव नाम यह । बन्दी- छोर दयाल, अशरण शरण उदार अति ॥ २ ॥

गुरुशतक सार नाम ॥ बोपाई ।

दीनबंधु करुणामयसागर । हंस उधारण तारण आगर ॥ दीना- नाथ शरण सुख दाई । अभय तासु पद गुरुसम राई ॥ बन्दीछोर बिरद अति तासु । हंसरूप परगट जगजासु ॥ अधमउधारण- तारणस्वामी । परवरदिगार मालिक अनुगामी ॥ काल जालके मेटनहारे । बिरद लाज राखन पति प्यारे ॥ धीरज दया तत्व संयुक्ता । राम भूमिका बासक युक्ता ॥ चिंता रहित अर्चित गोसाई । परमरूप परकाशक साई ॥ अखिल ब्रह्मांडके जानन- हारे । कर्ता नाम प्रगट विस्तारे ॥ निष्कामी माया परचंडा । ताको नासक पूरण ब्रह्मांडा ॥ मंगल रूप गोसाई आपू । जगत विदित पूरण परितापू ॥ साहेब निर्भय पद दातारा । कर्ता पुरुष सबनके पारा ॥ महा मोह दलनाशक स्वामी । हंसन नाह अपार अगामी ॥ आनंद सिंधु अहंतातीता । रामरूपमें परम पुनीता ॥ सत्य यथार्थ अतिप्रिय साधू । मन मायाको मेटेउ व्याधू ॥ पूजनीय अनुमान विनासिक । सत्यसुकृत प्रकाश प्रकाशिक ॥