कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
पिछले महरा जहाँ लग होते खोजत रहे भुलाईरे ॥ नौ दरवाजे हैं सिमरीके जे सबहि तुम रोकोरे ॥ पिछली प्रीति बिना कर जोरे दास पठावै छेकारे ॥ जिस सिमरीके रूप न रेखा नहि बरन नहि मेषारे ॥ जा खोजत सुरनर सुनि थूले कोई विरले पेखारे । झिलमिल नीर तिरवेनी संगम तहाँ ब्रह्मका बासारे ॥ कहै कबीर सुनो तुम साधो एक नामकी आशारे ॥
कहरा ३—नाम सुमिर मन नाम सुमिरि मन नाम सुमिर मन मेरारे ॥ आवत जात बहुत दुख पैहो धरि धरि तन बहु तेरारे ॥ बालापनके गुनह करम सब प्रगट कहौ सुनिहौरे ॥ सुखसे भेट भयी नहि कबहूँ बहु दुख दारुण कीयारे ॥ सरवन कथा सुनी नहि कबहूँ वचन सुचि मानारे ॥ नयना सुंदर रूप लुभाना यही करत मन माहिरे ॥ जीभ्या तेरी षड्दर राती है अंतर रस मानीरे ॥ नासा तेरी वासकी बासे विशेष विशेषारे ॥ सरवन तेरे रागके भीने अनहद शब्द न परेखारे ॥ कामी पड़े कामके वशमें छीतज दिन औ रातीरे ॥ एक घडीके सुखके काजै खोवे कुल और जातीरे ॥ संगी तुम्हरे गुता महरम लाजत नहि लबारारे ॥ राग बाग तन कस करि बांधो शब्द गहो हथियारारे ॥ गहि हथियार खेत मत छांडो रहियो खेत मंझारारे ॥ सूरा पनकी गति है न्यारी जाने संत कोई सुरारे ॥ पांच पचीस पकड़ि वश कीने जूझे गगन दुवारारे ॥ शूरा होयसो सम्मुख जूझै दरसै अलख अपारारे ॥ समष्टिको सतगुरु दर्शे परसे अपरम पारारे ॥ ऐसी रहन रहै कोइ हंसा आवै लोक हमारारे ॥ कहै कबीर नाम को कहरा परख शब्द टकसारारे ॥
कहरा ४—निहुरि नाच मन निहुरि नाचमें तेरी दुलहिनियारे ॥ निहुरे नाचे शब्द विचारै चित्र विचित्र रहिनियारे ॥ कुंवटा एक