कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मणि हैं, जोति उजारे खेले॥ और सकल सावनका कीड़ा, जगत पावतरि पेलै॥ सोई सुमेर जो उदय उजागर, जामें धातु निवासा॥ और सकल पाषाण बराबर, टांकी अग्नि प्रकासा॥ सोई पतिव्रता पियाव्रत साधे, आज्ञा कानि न लौपे॥ और सकल ये स्वान सूकरी, सुंदर नाम न औपे॥ कहैं कवीर सोई जन गुरुवा, नाम भजन अधिकारी॥ और सकल साहिबको बाना, देख्यो तत्त्व विचारी॥
गौरी २८-देखे एक सतगुरु संत सिपाई । प्रेम प्रीतिका पटा लिखाया, अभय जगीरी पाई॥ टे० ॥ सुरति सिगड़ी साज समझको, तनकी तुबक बनायी॥ दारू दम सहजका सीसा, ज्ञानको गज ठहकायी । शील सोपता प्रेमकी पथरी, चित चकमक चमकाई । जुगति जाम बुधिका मंदिरा, प्रीति पियालै पाई॥ सतनामका उठत पलीता, हरि ही होत हवाई॥ गम गोला गढ़ भीतर लागा, भरमकी बुरज दहवाई॥ सतसमसेर जुगति जम धर, छमाकी ढाल बनाई॥ मोह मोरचा पहले तोडा, माया भाग नशाई॥ मन मैवासी गठपतिराजा, जाकी फिरत दुहवाई॥ शब्द स्वरूप सदा सिर ऊपर, सुरति सुरंग लगाई॥ अकल गरीबी दावा दीना, लिया विवेक गढ़ आई॥ संत सूरमा गढ़ मेरा डाका, पकड़े गढ़के रोई॥ पकड़ै खान जान नहीं पावे, पकड़ी ममता बाई॥ साहिब कवीर चढ़ै गढ़ ऊपर, जीति निशान बजाई॥
गौरी २९-पूछे कोई संत सुजान सन्देशा । सतगुरु दियो उपदेश सबनको, चलो अपने देसा॥ टे० ॥ अगम संदेश अगोचर महिमा, नहीं जहां रूप निशानी॥ जीवन ब्रह्म सुरति नहीं मन गति, ऐसा पद निरवानी॥ या नगरी कोई रहन न
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