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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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शब्दावली

(७३९)

गौरी ३३-बन्दे नाम साहेबको लेरे । नाम विना तेरो काज न सरिहै फिर पीछे पछतैहै रे ॥ टेक ॥ एक लख पुत्र सवा लख नाती, संपति थिर न रहै रे ॥ लंकासे कोट विनसि गये, छिन्नमें ऐसी ब्यार वहै रे ॥ नदी नाव संजोग बनो है, ऐसे मिलना हैरे । ना कोई तेरा ना तू काहूका, पैडे खलक बहैरे ॥ ये तो सब स्वारथके गरजी, गुरु विन सुख न लहैरे ॥ छनिक माहिं तन विनसि जायगा फिर कछु कर न सकेरे ॥ ताते बेगि सम्हार अपनपौ, सत कवीर सत्य कहैरे ॥

गौरी ३४-जिवरा तू जायगो मैं जानी । आवेगी कोई लहर लोभकी, बूढेगो विन पानी ॥ टेक ॥ राजकरंते राजा जायगा, सेज संजती रानी । बेद पठनले पंडित जायगा, कथा सुननते ज्ञानी ॥ जोग करन्ते जोगी जायगा और जायगा अभिमानी । कहैं कवीर सत् भगति न जायगी, आदि अन्त ठहरानी ॥

गौरी ३५-अब तो ऐसेही बनि आई । भावे कोई निंदो भावे कोई वन्दो, छोड़ी लोक बढाई ॥ टेक ॥ कुलसे निकसि भई जब गनिका, बहुरि न कुलै समाई ॥ केहारे कोटि करै जु लंघन, भूखा घास न खाई ॥ भव सागर तरबेके कारन, नामकी नाव बनाई । हलके हलके पार उतारि गये, बूढे मान बढाई ॥ जैसे भृग नाद धुनि सुनिकै, प्रान तजत है आई । जैसे मीन मरै विन नीरा, जल विनु रह्यो न जाई ॥ परगयी छाप भक्ति अनुभवकी, उर अंतर लपटाई ॥ दास कवीर डिगै नहिं कबहुं, वाढी अमिट सगाई ॥

गौरी ३६-धोखा सबको मारे साधो, धोखा सबको मारे ॥ ऐसो है कोई संत विवेकी निरमल ज्ञान विचारे ॥ टेक ॥ कोई खोजै शिव सकतीको कोई खोजै काया ॥ कोई खोजै सून्य