कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 762, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(७४८)
कबीरपंथी—
भाव भगति चित लावै । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, क्यों न परम पद पावै ॥
राग कल्याण १३-भजनमें होत आनंद आनंद । बरसत शब्द अमीके बादल, भीजत है कोइ संत ॥ टे० ॥ अगर वरन जहाँ ततकी नदियां, मानो धारा गंग । करि अस्नान मगन होय बैठे, चढ़ तब शब्दको रंग ॥ रोम रोम जाके अमृत भीना, पारस परसत अंग । शब्द गहो जिव संशय नाहिं, साहेब है तेरे संग ॥ स्वासा सार रचो मेरे साहिब, जहाँ नहिं माया सोहंग । कहैं कवीर सुनो भाई साधो, जपो सोहंग सोहंग ॥
राग कल्याण १४-क्यों न हमारे आये केसो, क्यों न हमारे आये । षड्रस व्यंजन छाड़िरसोई, साग विडुर घर पाये ॥ टे० ॥ जहाँ अभिमान तहाँ हम नाहीं, वह व्यंजन विष लागे । सोई मुनिजन पूरा कहिये, जो अभिमानीको त्यागे ॥ जाति हीन जाके कुल नाहिं, है दासीको जायो । जाकी टपरिया तुम जइ बैठे, कहा बड़ापन पायो ॥ सत सत वचन कहो दुयौधन, सुन लो बात हमारी । विडुर हमारे प्रानसों प्यारे, तुम विषिया बेकारी ॥ पुरातन कथा तुम्हारी प्रभुजी, वनमें छाछ मंगाई ॥ ग्वालनके संग भोजन करते, सो मति तुम मैं आई ॥ प्रेम प्रीतिके हम हैं भूलें, अभिमानी नहिं भावै । कहैं कवीर साधुकी महिमा, हरि अपने मुख गावै ॥
राग कल्याण १५-कौन तुम्हारे आवै राजा, कौन तुम्हारे आवै । ऐसो हेतु विडुरको कहिये, सोई गरीब मोहि भावै ॥ टे० ॥ तुमरो दूध विडुरको पानी, अमृत करि करि जानी । तुमरी मेवा विडुरकी भाजी, रस भर एक न आनी ॥ भोजन तो दोऊ विधि राजा, विपत्ति परकी प्रीती । तुम्हारे प्रीति न हमरे