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भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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पृष्ठ 810

(७९६)

कवीरपंथी—

चुगना ॥ बिना नैन जहाँ देखन पेशा, तहाँ मृतक होय रहना ॥ चंद न सूर दिवस ना रजनी, तहाँ जाय सुरति मिलाई ॥ विन जिभ्या जहाँ अमृत अचवे, बिन जल तृषा बुझाई ॥ जहाँ कुछ नहीं तहाँ सब कुछ देखा, या सुख कासों कहना ॥ कहैं कवीर बल बल सतगुरुकी, धन्य शिष्यका लहना ॥

शब्द ७६—ऐसा कोई प्रेमका देखा मतवाला हो ॥ टे० ॥ छाक चढी क्षुधा बीसरी, पिया प्रेम पियाला ॥ पीवत तेहि तन बीसरी, सो जगतसे न्यारा ॥ कान सुना देखा नहीं, वाते मतवाला ॥ सो छाका निज नामसे, सतगुरुका प्याला ॥ गोली लागी ज्ञानकी, कसनी बहुते दीन्हा ॥ जीवतही मृतक होय रहे, जिन गुरुगम चीन्हा ॥ नामरसायन जो पिये, जग बहुर न आवे ॥ कहैं कवीर कोई छका, जेहि कछु और न भावे ॥

शब्द ७७—एक दिन होयगा प्रान बिगाना ॥ टे० ॥ जो लग प्रान बोले घट भीतर, तों लग करत गुमाना ॥ निकसे प्रान बाहिर कर डेरा, घरके लोग डराना । काठके ठठरीमें लेके चढावे, लै जमुना पहुँठामा ॥ पांच जने मिल फूँक दिये हैं, जर गये सुखके ग्रामा । कहे कवीर सुनो भाई साधू, या पद है निरवाना ॥ पद निरवान चीन्ह ना पावे, अंतकाल पछताना ॥

शब्द ७८—निस दिन माला जुगतकी फेरे ॥ टे० ॥ रवि शशि बांध मन धागा करे, गहि गहि तार सोहंगम घेरे ॥ बंक नाल चढ़ि गिरवर तरवरे, जब टकसार गगन गढ पैरे ॥ अर्ध उर्ध बिच अजब रंग कहिये, बरषे शब्द अमीरस झरे ॥ कहैं कवीर सुनो भाई साधू, ऐसा ध्यान कोई बिरले धरे ॥

शब्द ७९—हंसनके नाह तुम तबहीं कहाये हो ॥ टे० ॥ काशीमें केवल नाम माड़ौ है, उडीसा धाम पंडो पग जरत, देखत वहीँ