कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
यक सारा जी । पशुको मांस भखे सब कोई नलहिं न भखे सियारा जी ॥ ८० ॥ ब्रह्मकुलाल मेदिनि भरिया उपजि बिनसि कित गइया जी । मांस मछरिया जोपै खैया जो खेतनमें बोइया जी ॥ माटीको करि देवी देवा जीव काटि काटि देइया जी । जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लइया जी ॥ कहैं कवीर सुनो हो सन्तो राम नाम नित लिया जी । जो कटु कियो जिह्वाके स्वरथ बदल पराया देइया जी ॥ ७० ॥
शब्द ४५९—चात्रिक कहाँ पुकारै दूरी । सो जल जगत रहा भरपूरी ॥ ८० ॥ जेहि जल नाद बिन्दुका भेदा । षट्कर्म सहित उपान्यो वेदा ॥ जेहि जल जीव सीवका बासा । सो जल धरनि अमर प्रकाशा ॥ जेहि जल उपजे सकल शरीरा । सो जल भेद न जान कवीरा ॥ ७१ ॥
शब्द ४६०—चलहु का टेढो टेढो टेढो । दसौं द्वार नरकमें बूढे तू गंधीको वेढो ॥ ८० ॥ फूटे नैन हृदय नहिं सूझे मति एको नहिं जानी । काम क्रोध तृष्णाके मारे बूडि सुये विन पानी ॥ जारै देह भसम हँ जाई गाडे कीम किट खाई । सूकर स्वान कागके भोजन तनकी यहै बडाई ॥ चेत न देखु सुगुध नल बोरे तूते काल न दूरी । कोटिन जतन करे बहुतरे तनकी अवस्था धूरी ॥ बालूके घरवामें बैठे चेतत नाहिं अजाना । कह कवीर यक राम भजे विन बूढे बहुत सयाना ॥ ७२ ॥
शब्द ४६१—फिरहु क्या फूले फूले फूले । जो दस मास उरध मुख झूले सो दिन काहेक भूले ॥ ८० ॥ ज्यों माखी स्वादे लहि विहैर सोचि सोचि धन कीना । त्योही पीछे लेहु लेहु कर भूत रहनि कछु दीना ॥ देहरी लौं बर नारी संग है आगे संग सहेला । मृतक थान संग दियो खटोला फिर पुनि हंस अकेला ॥ जारे