सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 948, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 948

(९३४)

कवीरपंथी-

जम किंकर धर्म दूत हकारे। सत्तनाम सुन भागे सारें, जब सतगुरु नाम उचारा है ॥ १३ ॥ गगन मँडल बिच उर्धमुख कुइया, गुरुमुख साधू भर भर पीया । निगुरे प्यास मरे बिन कीया, जाके हिये अँधियारा है ॥ १४ ॥ त्रिकुटी महलमें विद्या सारा, धनहर गरजे बजे नगारा । लाल बरन सूरज उजियारा, चतुर कमल मंझार शब्द ओंकारा है ॥ १५ ॥ साथ सोईं जिन यह गढ लीन्हा, नौ दरवाजे परगट चीन्हा । दसवाँ खोल जाय जिन दीन्हा, जहाँ कुलुफ रहा मारा है ॥ १६ ॥ आगे सेत सुन्न है भाई, मानसरोवर पैठि अन्हाई । हंसन मिलि हंसा होई जाई, मिलै जो अमी अहारा है ॥ १७ ॥ किंगरी सारंग बजे सितारा, अच्छर ब्रह्म सुन्न दरबारा । द्वादस भानु हंस उँजियारा, षट दल कमल मँझार शब्द रंकारा है ॥ १८ ॥ महा सुन्न सिंध विषमी घाटी, बिन सतगुरु पावै नहि बाटी । व्याघर सिंह सरप बहु काटी, तहँ सहज अचित पसारा है ॥ १९ ॥ अष्ट दल कमल पारब्रह्म भाई, दहिने द्वादश अचित रहाई । बायें दस दल सहज समाई, यो कमलन निरवारा है ॥ २० ॥ पाँच ब्रह्म पांचों अँड बीनो, पाँच ब्रह्म निःअच्छर चीन्हों। चार मुकाम गुप्त तहँ कीन्हो, जा मध बंदीवान पुरुष दरबारा है ॥ २१ ॥ दो पर्वतके संध निहारो भँवर गुफातें संत पुकारो । हंसा करते केल अपारो, तहाँ गुरन दर्बारा है ॥ २२ ॥ सहस अठासी दीप रचाये, हीरे पत्रे महल जड़ाये। सुरली बजत अखंड सदाये, तहँ सोहँ झनकारा है ॥ २३ ॥ सोहँ हृद तजी जब भाई, सत्तलोककी हृद पुनि आई। उठत सुगंध महा अधिकार्ई, जाको वार न पारा है ॥ २४ ॥ षोडस भानु हंसको रूपा, बीना सत धुन बजे अनूपा । हंसा करत चैवर शिर भूपा, सत्त पुरुष दर्बारा है ॥ २५ ॥ कोटिन भानु उदय जो होई, एते ही पुनि चंद्र