कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(११)
गुन आगाँर। होत प्रवीन नीतियुत तिनके, सुनि उपदेश उदार ॥ जाघर सन्त दया करि जनि पर, आवत लेन अहार। ताघर दुख दारिद्र नाश होय, भरत अटँलभण्डार ॥ जो नहिँ होते सन्त जगत्में, को अस करि उपकार ॥ हूवत आय करत जीव- नको, भवसागरके पार ॥ कहि न सकत कवि कोविंद कोऊ, सन्तनको व्यवहार। निशि वासर गुण गावत मान्यो, शेष सहस मुखहार ॥ रवि नहिँ होत मँलीन दुष्टके, लाय उड़ाये छार। कहैं कवीर सन्तकी निन्दा, करै ताहि धिक्कार ॥ ३९ ॥
जपु मन सत्य नाम सुखदाई। जो तूं चाहे आय जगत्में अपनी सूठ भलाई ॥ ८० ॥ गर्भवासमें भक्ति कबूल्यो, सो सब सुधि विसराई। आय परचो मायाके फन्दे, मोह जाल अरुझाई। मानुषिता सुत भाइ बन्धु तिय, बहिन भुवा भौजाई। अपने २ स्वारथ कारण प्रीति करत सब आई ॥ भवसागरमें भटकत २, यह मानुष तन पाई। खोवे बूथा भक्ति बिन प्रभुकी, धिक ऐसी चतुराई ॥ कहैं कवीर चेतु अबहूँ नहिं, फिरि चौरासी जाई। पाय जन्म शूकर कूकरको भोगेगा दुख भाई ॥ ४० ॥
प्रभातो (समय-प्रातः-काल)
(श्री १०८ युवत महंत शम्भूदास साहेब विरचित)
जयति जय धर्मधुर धीर कव्वीरगुरु, जयति जय वीर वर ब्रह्मचारी। दहनर्वनमोह गुणगहेन भूषितं विभो, भक्त भवैशूल निमूँलैकारी ॥ ८० ॥ अच्युतानन्द सुदकैन्द स्वच्छेद दलिं, दोषदुखद्वैन्द लीलाऽवतारी। कम्बुकैर्पूर मदचैर अतिधवलैवपु,
१ घर. २ अक्षय कोठार. ३ पण्डित. ४ मँला. ५ धर्मके चलानेवाले. ६ धैर्यवान्. ७ अष्टबलवान्. ८ मोहरूपी बनको भस्स करानेवाले. ९ अनन्त गुण. १० शोषित. ११ प्रभु. १२ भक्तोंका जन्मरणादिक दुःख १३ नाशकर्ता. १४ अखण्डसुख. १५ आनन्दमूल १६ बन्धनरहित. १७ नाश करके. १८ उत्पात. १९ कौतुके प्रगट भये. २० शंख और कपूर. २१ निरादर करके २२ परम शुद्धरूप.