कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५८२ श्रीकालिका पुराण ५८२ १०७ है क्योंकि मैं यह सभी आप लोगों को बतला रहा हूँ। जिस समय से वशिष्ठ जी ने देवी अरुन्धती का विवाह किया था। हे द्विजो! उसी समय में वैवाहिक जलों से शिप्रा नदी समुत्पन्न हुई थी। वह समागत होकर शासन से शिप्र सरोवर में गिरी थी जिस प्रकार से भागीरथीं गंगा भगवान विष्णु के चरणों से शिव जल वाली सागर में पतित हुई थी। पहले समय में देवों के उपयोग करने के लिए ही धाता ने इसका विशेष निर्माण किया था जो हिमवान् के शिखर पर एक महान शिप्र नाम वाला सरोवर है। वहाँ पर आज भी अप्सरागणों के सहित इन्द्र देव अपनी शची को साथ में लेकर उस परम शुभ जल में रमण किया करते हैं। आज तक भी वह देवों के द्वारा एक रत्न की ही भाँति सर्वदा यत्न के साथ रक्षित हुआ करता है। वहाँ पर तप के प्रभाव से मुनिगण इस परमशुभ सरोवर में गमन किया करते हैं। महान् यत्न से ही वे लोग शिप्रा नाम वाले सरोवर के उसके जल में स्नान करने के लिए तथा पान करने को जाया करते हैं। वहाँ पर मनुष्य हैं जो योग से उसके जल का स्नान तथा पान करके अविकल इन्द्रियों वाले होते हुए अवश्य ही देव के स्वरूप को प्राप्त हो जाया करते हैं। हे द्विजोत्तमों! यह सरोवर वर्षा ऋतु में भी वृद्धि को प्राप्त नहीं होता है। तात्पर्य यह है कि अन्य प्राकृत जलाशयों के समान यह सरोवर का जल नहीं बढ़ा करता है और यह गर्मी की ऋतु में शोषण को भी प्राप्त नहीं हुआ करता है। यह तो सर्वदा ही जैसा है वैसा ही रहा करता है। न घटता है और न कभी बढ़ता ही है। हे द्विजश्रेष्ठों! शिप्र के गर्भ के मध्य में स्थित जल प्रतिदिन बढ़ता था। वहाँ पर उस बढ़े हुए जल को पहले भगवान् हरि ने अपने चक्र के द्वारा लोकों की भलाई करने की भावना से गिरि के शिखर का भेदन करके उस नदी को परमपुण्य करके पृथ्वी की ओर प्रेरित कर दिया था। जाह्नवी गंगा के ही समान फल देने वाली वह नदी स्नान करने वालों को पवित्र करती हुई दक्षिण सागर को चली गयी थी। क्योंकि वह नदी शिप्र नाम वाले सरोवर से ही समुत्पन्न हुई थी अर्थात्