भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 442 में से

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पृष्ठ 109

११० ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ अर्थात् कठिन कष्टप्रद तप का समाचरण करके मर्यादा की स्थापना करके ही इसके पश्चात् अपने जीवन का त्याग करूँगी । जिस मेरे शरीर में मेरे पिता ब्रह्माजी ने अपने मन को अभिलाषा से समन्वित स्वयं किया था जब उस शरीर से भाइयों के साथ कुछ प्रयोजन भी नहीं है । जिस अपने शरीर के द्वारा सहज स्वीय तात में काम का भाव उद्भावित कर दिया गया था वह शरीर कभी सुकृत की साधना करने वाला नहीं है । इस प्रकार से संध्या मन के द्वारा भली-भाँति चिन्तन करके वह परम श्रेष्ठ पर्वत पर चली गयी थी जो चन्द्रभाग नाम वाला था और जिससे चन्द्रभाग नाम वाली नदी निकली थी । सवर्ण समान और समुदित चन्द्र से जिस रीति से उदयपर्वत निरन्तर शोभित हुआ था ठीक उसी भाँति उस संध्या के द्वारा वह पर्वत उस समय समाधिष्ठित हुआ और शोभित हुआ । चन्द्रमा को शाप का वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर उस श्रेष्ठ पर्वत की ओर गमन की गयी संध्या को देखकर जो कि तपश्चर्या करने के लिए नियत आत्मावाली थी, ब्रह्माजी ने अपने सुत से कहा था । वह पुत्र वशिष्ठ मुनि थे । वशिष्ठ संशित आत्मावाले, सब कुछ ज्ञान रखने वाले, ज्ञानयोगी, समीप में ही सुसमासीन और वेदों तथा वेदों के अंग शास्त्रों में पारगामी थे । ब्रह्माजी ने कहा-हे वशिष्ठ! आप जाइए जहाँ पर मनस्विनी सन्ध्या ने गमन किया है। वह संध्या तपस्या करने के लिए इच्छा रखने वाली हैं । आप जाकर इसको विधि के अनुसार दीक्षा दीजिए । पहले यहाँ पर कामुकों को देखकर उसको लज्जा हो गयी थी । हे मुनिश्रेष्ठ! उसने आपको, मुझको और अपने आपको सकाम ही देखा था अर्थात् सभी के अन्दर कामवासना का अवलोकन किया था । पूर्व में होने वाले आयुक्त रूप ने संयुत कर्म को विचार करके वह हमारे और अपने भी प्राणों का भली-भाँति परित्याग करने की इच्छा करती है । इस प्रकार से जो मर्यादा से रहित पुरुष हैं उनमें वह

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