भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 442 में से

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पृष्ठ 116

൵०൵ श्रीकालिका पुराण ൵०൵ ११७ जाकर उन महामुनि के लिए प्रणिपात किया था। इसके अनन्तर उस समय अपने आसन को ग्रहण करके दक्ष प्रजापति ने भली भाँति वन्दना करने वाले चन्द्रमा से सामपूर्वक यह कहा था-आप अपनी भार्याओं से समानता का ही व्यवहार करिए और विषम व्यवहार का परित्याग कर दीजिए। विषमता में ब्रह्माजी ने बहुत से दोष परिकीर्त्तित किये हैं। दाराओं में काम के अनुबन्धन से वे दारारति और पुत्र की कला वाली होती हैं। काम का अनुबन्धन संसर्ग से ही होता है और वह ससर्ग संगम से हुआ करता है और संगम अभिध्यान और वीक्षण से समुत्पन्न होता है इस कारण से आप भार्याओं में अभिध्यान और वीक्षण आदि करिए। यदि इस मेरे धर्म से नियन्त्रित वचन को आप नहीं करते हैं तो उस समय में आप लोक के वचनों से दोषयुक्त और आप वाले हो जायेंगे। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-महात्मा दक्ष के उस वचन का श्रवण करके चन्द्रदेव ने भी 'ऐसा ही होगा'-यह दक्ष की शंका से कह दिया था। इसके अनन्तर दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्रियों को तथा जामाता इन्दु को अनुमन्त्रित करके उस समय में वह मुनिकृतकृत्य होकर अपने आश्रम को चले गये थे। दक्ष के चले जाने पर फिर चन्द्रमा ने उस रोहिणी के पास प्राप्त होकर उसमें और उन शेष पत्नियों से पूर्व जैसा ही भाव ग्रहण किया था क्योंकि रोहिणी में उसका अनुराग था। वहीं पर रोहिणी को प्राप्त करके अन्य किसी को भी वह नहीं देखता था। वह सर्वदा रोहिणी ही में निवास किया करता था। फिर वे सब कुपित हो गई थीं। वे सब अपने दुर्भाग्य के कारण उद्विग्न मन वाली होती हुई पिता के समीप में जाकर उन्होंने कहा था कि सोमदेव हम लोगों में निवास न करते हैं और वे सदा ही रोहिणी का सेवन किया करते हैं। उसने अपने वाक्य को भी ग्रहण नहीं किया। अतएव आप हमारे रक्षक होओ। उसी क्षण में मुनि उस उद्वेग और क्रोध से संयुत होकर उठ खड़े हुए थे और मन में विधु के समीप में जाकर क्या करना है इसका ध्यान करते जा रहे थे।