कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४२ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵ अग्नि में मुनियों के द्वारा उपलक्षित न होती हुई उस समय में भगवान विष्णु ने प्रसाद से विधाता की पुत्री ने प्रवेश किया । फिर उसी क्षण में उसका शरीर पुरोडाश से परिपूर्ण हो गया था । दग्ध हुई पुरोडाश की गन्ध लक्षित होती हुई ही विस्तार को प्राप्त हो गई थी । वह्नि ने उसके शरीर का दाह करके पुनः भगवान् विष्णु की ही आज्ञा से शुद्ध को सूर्य मण्डल में प्रवृष्टि कर दिया था । सूर्य का दो भागों में विभाग करके उसके शरीर की उस समय में रथ में जो अपना था, पितृगण और देवों की प्रीति के लिए संस्थापित कर दिया था । उसका अर्धभाग हे द्विजोत्तमो! अर्थात् उसके शरीर का आधा हिस्सा प्रातः सन्ध्या हो गई थी जो अहोरात्र आदि के मध्य में रहने वाली थी । उसका शेष भाग था जो अहोरात्रान्त के मध्य में रहने वाली वही वह सायं सन्ध्या हो गयी थी । जो सदा ही पितृगणों की प्रीति को प्रदान करने वाली थीं । सूर्योदय से प्रथम जो अरुण का उदय जिस समय में होना है प्रातः सन्ध्या उसी समय में उदित हुआ करती है जो देवगणों की प्रीति को करने वाली हैं । सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने पर शोण (रक्त) पद्म के सदृश होती है वह सायं सन्ध्या भी समुदित हुआ करती है जो पितृगणों के मोद के करने वाली हुआ करती है । उनके प्राणों को प्रभु भगवान के द्वारा शरीरों के दिव्य शरीर से ही किये थे । महामुनि के यज्ञ के अवसान के अवसर प्राप्त करके हो जाने पर मुनि के द्वारा तपे हुए सुवर्ण की प्रभा के तुल्य पुत्री वह्नि के मध्य में प्राप्त हुई थी । उस समय में उस पुत्री को मुनि ने आमोद से समन्वित होकर ग्रहण कर लिया था । उस पुत्री को यथार्थ जल में संस्पनन कराकर कृपा से युत होते हुए अपनी गोद में रखा था और उनका नाम अरुन्धती, यह महामुनि ने रखा था । वे शिष्यों में परिवृत होते हुए वहाँ पर महान मोद को प्राप्त हुए थे । वह जिस किसी भी कारण से धर्म का विरोध नहीं करती थी अतएव त्रिलोकी में विदित नाम उसने प्राप्त किया था अर्थात् वह जैसा