कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५३ के जल को रखकर आशीर्वाद करने वाले मन्त्रों से, गायत्री से और द्रुपदादि मन्त्रों से ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने स्वयं ही उन दोनों का स्नपन किया था। इसके अनन्तर अन्य महर्षियों ने और जो देवर्षियों ने शान्ति की थी। उन सबने महान स्वर समन्वित ऋक्, यजु और साम वेदों के मन्त्र भागों द्वारा गंगा आदि सरिताओं के जलों से उन दोनों को फिर शान्ति की थी। तीनों भुवनों में सञ्चरण करनेवाला सूर्य के समान वर्चस् वाला विमान जो अव्याहत गति से समन्वित था और जल के सहित कमण्डलु उन दोनों के लिए ब्रह्माजी ने हाथ में दिया था। भगवान् विष्णु ने दुष्प्राप्य उत्तम स्थान दिया था जो मरीचि आदि के समीप में सब देवों का ऊर्ध्व था। भगवान् रुद्रदेव ने उन दोनों के लिए सात कल्पों के अन्त पर्यन्त जीवित बने रहने का वर दिया था। अदिति ने कुण्डलों का जोड़ा दिया था जो ब्रह्माजी के द्वारा अपने ही द्वारा निर्माण किये गए थे। उस समय में मेधातिथि ने कुण्डल अपने कानों से निकालकर पुत्री के लिए दिये थे। सावित्री ने पतिव्रता होना ओर बहुला ने बहुत पुत्रों वाली होना ये आशीर्वाद दिया था। देवेन्द्र ने बहुत से रत्नों का समूह कुबेर के ही समान दिया था। इस रीति से देवगण, मुनियों, देवियों और जो भी अन्य जन वहाँ पर उपस्थित थे सबने यथायोग्य दान उन दोनों के लिए पृथक्-पृथक् दिया था। इस प्रकार से विधिपूर्वक विवाह करके सुवर्ण के मानस पर्वत पर वशिष्ठ और अरुन्धती रहे थे और वशिष्ठ जी ने उस अरुन्धती के साथ परम हर्ष प्राप्त किया था। विवाह के अवभृथ के लिए और शान्ति के लिए जो सुरों के द्वारा लाया हुआ जल था वहाँ पर वह जल मानस पर्वत की कन्दरा में गिरा था। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव के हाथों में समुदीरित वही जल सात भागों में विभक्त होकर मानस पर्वत से गिरा था। उससे शिप्रा नदी समुत्पन्न हुई थी जो भगवान विष्णु के द्वारा भूमण्डल में प्रेरित की गई थी। महाकौषी के प्रपात में जो पतित हुआ था उससे कौषकी नाम वाली नदी उत्पन्न हुई थी और जो विश्वामित्र ऋषि के द्वारा अवतारित