कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंൠ श्रीकालिका पुराण ൠ १६१ की व्यवस्था से युग व्यवहार नहीं है और धर्म आदि की भिन्नता भी नहीं है । किन्तु मनुष्यों का चतुर्युग अर्थात् चारों युग सदा देवों का युग होता है । इकहत्तर देवों के युगों से एक मन्वन्तर हुआ करता है । देवों के दो सहस्त्र युगों का ब्रह्माजी का एक अहोरात्र हुआ करता है । मनुष्यों के मान से दो सहस्त्र चारों युग होते हैं । एक ब्रह्माजी के दिन में चौदह मनु होते हैं । इस प्रकार से ब्रह्मा के मान से तीन सौ दिनों से आठों से वत्सर होता है जैसे मनुष्यों का है वैसे ही ब्रह्मा का वर्ष होता है । ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मा के पाँच सौ वर्षों से परार्ध कीर्त्तित किया गया है । वह ईश्वर का दिवस है और उतनी ही रात्रि कही जाती है । ब्रह्माजी के एक शत वर्ष का काल दूसरा परार्धक होता है द्वितीय परार्ध के व्यतीत हो जाने पर जो ब्रह्मा का है, प्रलय होता है । पर ब्रह्मा के लीन हो जाने पर जगतों का आधार, अव्यय और पर से भी पर है । उस ब्रह्मा के स्वरूप के दिवारात्र का जो होता है उससे हर नाम उसका आधा परार्ध कहा जाता है । जगत् के स्वरूप वाले भगवान् परमात्मा का अक्षर और अव्यय होता है । जो स्थूल से स्थूलतम और जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम माना गया है उसका दिवारात्रि का व्यवहार नहीं होता है और वत्सर ही है । किन्तु पूर्व पौराणिकों के द्वारा और उस प्रकार के हमारे भी द्वारा सृष्टि और प्रलय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अहर्निश कल्पित किया जाया करता है । वह ही रात्रि है, वही वर्ष है और वह क्षिति है तथा सृष्टि के करने वाला हर है । वह विष्णु के रूप वाले पुराण पुरुष हैं । उसी से यह समस्त उसी की भांति विभात होता है । यह शाश्वत परमात्मा ब्रह्म के लीन होने पर यह सम्पूर्ण जगत् क्रम से ही उसके रूपत्व के लिए गमन किया करता है अर्थात् उसी का स्वरूप बन जाया करता है । ब्रह्मा के सौ वर्ष के अन्त में रुद्रदेव के स्वरूप वाले भगवान जनार्दन स्वयं इस जगत का अन्त करके परमरूप में लीनता को प्राप्त हो जाते हैं । सबसे प्रथम तो सवित अपनी परम तीक्ष्ण किरणों से स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत् के जल का शोषण करके स्वयं ग्रहण