कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ परमेश्वर प्रभु ने शब्द के लक्षण वाले आकाश को शब्द की तन्मात्रा से सृजित किया था। उस प्रकार से शब्द मात्रा को उस भूतादि ने समावृत्त कर लिया था। शब्द तन्मात्रा के सहित स्पर्श तन्मात्रा से शब्द से समन्वित स्पर्श गुण वाला वायु समुत्पन्न हुआ। आकाश और वायु से संयुत रूप तन्मात्रा से देदीप्यमान तेज हुआ था जो सभी ओर से समन्वित हुआ था इसके उपरान्त वायु तेज से युक्त विपत से जल की उत्पत्ति हुई। वह रत तन्मात्रा से भली-भाँति सभी ओर से उसके द्वारा व्याप्त हो गया था। जल को भी जो अपरमिति वाले भगवान विष्णु की आधार शक्ति है। उसने निराधार और अनिल के द्वारा आन्दोलितों को धारण किया था। सबसे प्रथम परमेश्वर प्रभु ने उनमें बीज का सृजन किया था। यह बीज हेमअंड हो गया था जिस अण्ड की प्रभा सहस्त्रांशु के ही समान थी। महत्तत्व के आदि लेकर विशेष के अन्त पर्यन्त सबसे समावृत होकर आरम्भ किया था। जल, अग्नि, अनिल, आकाश, तम और भूतादि से समावृत्त जिस तरह से महान से भूतादि होते हैं वह अण्ड दश गुणों से समावृत्त था। जिस रीति से वाह्य दलों में बीज व्याप्त होता है ठीक उसी भाँति से ही हे द्विजो! यह तोय आदि से अतुल ब्रह्माण्ड व्याप्त था। उस अण्ड के मध्य भगवान विष्णु स्वयं ही ब्रह्मा के स्वरूप वाले शरीर को रखकर दिव्यमान से वह एक वर्ष पर्यन्त स्थित होकर उन्होंने अपनी बुद्धि से बीजगण को ग्रहण किया था। ध्यान के द्वारा उस अण्ड को स्वयं ही दो भागों में करके वह एक क्षणभर उसमें संस्थित रहे थे। उसी समय इसी के द्वारा सृष्टि गन्धोत्तर समस्त तन्मात्राओं के समूह हुए थे और यह स्पर्श, शब्द, समस्त का रूप गन्ध और रस की आधारभूत थी और समस्त उन तन्मात्राओं के समुदाय से सम्पूर्ण पृथ्वी आधार की गयी थी। उनके उत्थित हुओं से यह कनकाचल समुत्पन्न हुआ था और जटायुओं से पर्वतों का संचय हुआ था। गन्धोदकों से सात सागर हुए और दो स्कन्धों से त्रिदशालय अर्थात देवों के निवास