कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १७५ समस्त लोकों की धात्री हैं और आप शरीरधारियों की अविद्या हैं। आप जाधर शक्ति देवी हैं और आप ही इस ब्रह्माण्ड को धारण करने वाली हैं। आप ही समस्त जगतों की तीन गुणों के स्वरूप वाली अर्थात् सत, रज और तम से संयुत प्रकृति हैं। आप सावित्री और गायत्री तथा आप सौम्य से भी अत्यधिक शोभना हैं आप नित्य भगवान हरि की सृजन की इच्छा हैं। आप सुषुप्ति अर्थात् शयन करने की इच्छा हैं। आप पुष्टि, लज्जा, क्षमा, शान्ति हैं और आप परमेश्वरि द्युति हैं। आप ही भूमि के स्वरूप से इस सम्पूर्ण चराचर को धारण किया करती हैं। आप अर्थात् जल हैं और आप जलों को जन्म देने वाली माता हैं। आप सबके अन्दर रहकर संचरण करने वाली हैं। आप स्तुति, स्तुत्य, स्तोत्री हैं तथा आप ही स्तुति की शक्ति हैं। मैं आपकी क्या स्तुति करूँगा, हे परमेश्वरि! आप प्रसन्न हो जाइए। हे जगत की माता! आपको नमस्कार है। अब आप भगवान जनार्दन को प्रबोध करा दो अर्थात् उनको जगा दीजिए। इस प्रकार से लोकों की रचना करने वाले ब्रह्माजी के द्वारा महामाया की स्तुति की गयी थी। फिर उसकी नासिका, मुख, बाहु हरि के हृदय से निकले थे और उनके राजसी मूर्ति का समाश्रय ग्रहण करके वह ब्रह्माजी के दर्शन में स्थित हो गई थी। इसके उपरान्त जनार्दन शेष की शय्या पर निद्रा लेते हुए थे उस निद्रा से एक ही क्षण में उठकर खड़े हो गये थे और फिर सृष्टि की रचना करने की वृद्धि की थी। फिर वाराह के स्वरूप से जल में निमग्न हुई पृथ्वी को शीघ्र ही समुद्धृत करके उसको जल के ऊपर रख दिया था। उस जल के समुदाय के ऊपर वह बड़ी विशाल भाव की ही भाँति स्थित हो गयी थी। देह के बहुत विशाल एवं विस्तृत होने से वह मही संप्लव को प्राप्त नहीं हो रही थी। फिर भगवान हरि स्वयं वहाँ पर उपस्थित हुए थे और अपनी माया से जल से समूह का संहार करके जन्तुओं की स्थिति के लिए स्वयं की प्रभु प्रवृत्त हो गये थे। पूर्व में जैसे थे उसी के समान भगवान अनन्त भी वहाँ पर भूमि के तल प्रदेश में