भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 442 में से

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पृष्ठ 196

१९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ श्रवण कीजिए। भौंह और नासिका की सन्धि से महान अध्वर यज्ञ ज्योतिष्टोम नाम वाला उत्पन्न हुआ था। ठोड़ी, कान की सन्धि से वह्निष्टोम नामक यज्ञ समुद्भूत हुआ था। चक्षु और भौहों की सन्धि व ओष्ठों से पौनर्भवष्टोम व क्रत्यष्टोम यज्ञ समुत्पन्न हुआ। जिह्वा के मूल से वृद्धष्टोम और वृहतृष्टोम दो यज्ञ उत्पन्न हुए थे। नीचे जिह्वा के अन्तर्भाग से अतिरात्र और सर्वराज नाम वाले यज्ञों ने जन्म ग्रहण किया था। अध्यापन, ब्रह्म, यज्ञ, पितृ, यज्ञ, तर्पण, होम, दैव, बलि, मौत, नृयज्ञ, अतिथि पूजन स्नान और तर्पण पर्यन्त नित्य यज्ञ सर्वकण्ठ सन्धि से समुत्पन्न हुए थे तथा समस्त विधियाँ जिह्वा से उत्पन्न हुई थीं। वाजिमेध, महामेध तथा नरमेध ये तथा जो अन्य हिंसा के करने वाले यज्ञ हैं वे सब पादों की सन्धि से समुत्पन्न हुए थे। राजसूय यज्ञ अर्थकारी तथा वाजपेय यज्ञ पृष्ठ की सन्धि से समुद्भूत हुए थे और उसी भाँति जो ग्रहण यज्ञ थे वे भी समुत्पन्न हुए थे। प्रतिष्ठा स्वर्ग यज्ञ तथा दान श्रद्धा आदि यज्ञ हृदय की सन्धि से पैदा हुए थे। इसी तरह से सावित्री यज्ञ भी उत्पन्न हुआ था। समस्त सांसारिक अर्थात् संस्कार करने वाले अथवा संस्कारों से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ और जो यज्ञ प्रायश्चित करने वाले हैं। (पापों की शुद्धि के लिए जो भी व्रत, दान, होमादि किए जाते हैं वे प्रायश्चित कहे जाते हैं। ) ये सब मेढ़ की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। रक्ष सत्र अर्थात् राक्षस यज्ञ, सर्प सत्र और सभी जो भी अभिचारिक यज्ञ हैं अर्थात् अन्य प्राणियों के मारणात्मक हैं वह सभी उनके खुरों से हुए थे। माया सृष्टि, परमेष्टिग्रीष्यति, भोग सम्भव तथा अग्निष्टोम यज्ञ लाँगूल की सन्धि में समुद्भूत हुए थे। जो नैमित्तिक यज्ञ हैं जिनको कि संकालि आदि पर्वों पर कीर्त्तित किया गया है वे और द्वादश वार्षिक सभी लांगुल सन्धि में समुत्पन्न हुए हैं। तीर्थ, प्रयोग, साम, संकर्षण यज्ञ, आर्क, आकर्षण यज्ञ ये समस्त नाड़ियों की सन्धि से उत्पन्न हुए थे। ऋचोत्कर्ष, क्षेत्रयज्ञ, ये सब जानु में समुत्पन्न हुए थे। हे द्विजसत्तमो! इस रीति के एक सहस्र आठ यज्ञ समुद्भूत थे। निरन्तर

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