कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ 卐 श्रीकालिका पुराण 卐 मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-स्वायम्भुव मनु के इस वचन का श्रवण करके सिद्ध कपिल बहुत अधिक कुपित हुए थे और उस समय उन्होंने मनु से कहा। कपिल देव बोले-शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त करने के लिए मैंने आपसे स्थान की प्रार्थना की थी किन्तु आप तो बहुत से हेतुओं के द्वारा मेरे ही ऊपर आक्षेप कर रहे हैं। आपके इस अत्यन्त उग्र वचन को मैं सहन करने में असमर्थ हूँ। आप स्वयं तीनों भुवनों के अध्यक्ष हैं यही आपका ऐसा गर्व है। आप मुझे आपका यह वचन क्षमा करने के योग्य नहीं है कि आप मेरी की हुई प्रार्थना को विकत्थन कह रहे हैं। ऐसा जो आप कहते हैं उसका यह फल प्राप्त करिए। यह तीनों भुवनों जिसमें देव, असुर और दानव निवास किया करते हैं इनका अब हत-प्रहत और विध्वंस बहुत ही शीघ्र हो जायेगा। जिसने इस पृथ्वी का उद्धार दिया था अथवा जिसके द्वारा यह पुनः स्थापित की गयी थी, जो इसका अन्तकर्ता है अथवा जो इसकी परिरक्षा करने वाला है वे ही सब सम्पूर्ण चराचर की हिंसा करे। हे मनुदेव! आप शीघ्र ही इन तीनों भुवनों को जल से पूर्ण देखेंगे। आपके गर्व के कारण यह सब हत-प्रहन और विध्वंस हो जायेगा। तपों के निधि मुनीन्द्र कपिलदेवे यह वचन कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये थे और फिर वे मुनि उसी समय ब्रह्माजी के स्थान को चले गये थे। कपिल देव के इस वचन को सुनकर मनु का मुख विषाद से युक्त हो गया था। वह होनहार है, ऐसा समझकर उस मनु ने कुछ भी नहीं कहा था। इसके अनन्तर परम बुद्धिमान स्वायम्भुव मनु ने तपस्या करने के लिए ही मन में धारणा की थी। वे समस्त जगतों की भलाई के लिए भगवान् गरुड़ध्वज के दर्शन प्राप्त करने की इच्छा वाले हुए थे। वे गंगा द्वार के समीप में परम विशाल बद्रीविशाल को गमन कर गए थे। वहाँ पहुँचकर जत के धर्त्ता स्वायम्भुव मनु ने स्वयं ही पापों के विनाश करने वाली पुण्यतोया बदरी का वहाँ पर दर्शन किया था। जो सदा फलों वाली थी और नित्य ही कोमल शाद्वल की मञ्जरी से समन्वित थी, जो सुन्दर छाया वाली, मसृण और सूखे हुए यंत्रों से रहित थी।