भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 442 में से

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पृष्ठ 202

२०४ ੴ श्रीकालिका पुराण ੴ वे प्रभु उस समय में महान् आत्मा वाले, कारुण्य से युक्त, सुमन्त्रस्त अर्थात् भययुक्त गद्गदता से समन्वित उन स्वायम्भुव मनु से बोले-हे तपोनिधि! हे महाभाग! आप डरे हुए मेरी रक्षा करने के योग्य होते हैं। विशाल मत्स्यों से मैं परमभीत (डरा हुआ) हूँ जो मुझे कहीं खा न जावें इसीलिए मैं नित्य ही उद्वेग वाला रहता है। हे महाभाग! प्रतिदिन की बड़े-बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए मेरे पीछे दौड़ लगाया करते हैं। सभी ओर से बड़ी संख्या में बड़े मत्स्य मुझे खाने के लिए आया करते हैं। हे नाथ! आप मेरी रक्षा करने के लिए समर्थ हैं। आज बड़े-बड़े रोमों वालो से, बड़े और बहुतों के द्वारा मैं विदारित किया गया हूँ। सबसे छोटा थक गया हूँ और भागने में परम असमर्थ हूँ। मैं अपने प्राणों के रक्षित करने की इच्छा वाला हूँ। आप महान आत्मा वाले हैं ऐसे मुनि मैं आपकी शरणागति मैं प्राप्त हुआ हूँ। यह आपका परम अनुग्रह हैं। आप मेरी रक्षा कीजिए। भय से उद्भ्रान्त मन वाला मैं चंचल तरंगों वाली परम चंचल इस वृक्षों की छाया का अवलोकन करके मत्स्य की ही भाँति डर रहा हूँ। मार्कण्डेय मुन ने कहा-इसके अनन्तर इस अनेक वचन का श्रवण करके स्वायम्भुव मनु परमाधिक कृपा से समन्वित होकर उनसे बोले थे कि मैं आपकी रक्षा करने वाला हूँ। फिर हाथ में जल लेकर उस मत्स्य को उसमें निधापति करके समक्ष में उस परमक्षुद्र मत्स्य के विहार का अवलोकन करने लगे थे। इसके अनन्तर परम दयालु मनु ने सुन्दर स्वरूप वाले उस मत्स्य को जल से पूर्ण विपुल योग वाले अलिञ्जर में रखा दिया था। वह मत्स्य उन मणिक में दिन-दिन में बढ़ता हुआ सामान्य रोहित के शरीर वाला शीघ्र ही हो गया। वह महात्मा प्रतिदिन दश घट जल से पूरिपूर्ण उस मणिक को बढ़ाते रहे थे और मत्स्य को वर्धित कर दिया था। अर्थात् वह मत्स्य बड़ा होता चला गया था और बड़े-बड़े नेत्रों वाला एक बालक मत्स्य थोड़े ही समय में उस मणिक के जल के मध्य में लोमों से युक्त पीन देह वाला हो गया था। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-स्वायम्भुव मनु ने उस प्रकार से स्थूल

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